निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४२ ) ७ अ० २ पा० ३ खं० रूप में सदा पुरुषाकार रहता है, और अग्नि, वायु आदि कर्म रूपों से सदा ही अपुरुषाकार रहता है। इनमें तीसरा यास्कमत और चौथा आख्यानमत है ही। इति हिन्दीनिरुक्ते सप्तमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥७ (२)॥ (खंड २) १- "ऋष्वात इन्द्र०"। शंयु ऋषि। त्रिष्टुप् छन्दः। इन्द्र देवता। एकादशिनी में इन्द्र के पशुकी याज्या। २- "यत्तसंगृभ्णा०" की व्याख्या हो चुकी (अ० ६ पा० १ खं० २)। ३- " आद्वाभ्यां० " गृतसमद ऋषि। इन्द्र देवता। त्रिष्टप् छन्दः। ४- "अपाःसोम ०"-० कल्याणीर्जाया" विश्वामित्र ऋषि। त्रिष्टुप् छन्दः। हारियोजन की अनुवाक्या। ५- " इदं हविर्मघवन्०-०"अद्धीन्द्र पिब च"। अग्नियुत नाम स्थूरपुत्र ऋषि। त्रिष्टुप् छन्दः। इन्द्र देवता। ६- "आश्रुत्कर्ण"मधुच्छन्दस् ऋषि। अनुष्टुप् छन्दः। इन्द्र देवता। ( खं० ३ ) ७-"एते वदन्ति०-०अभिक्रन्दन्ति०" अर्बुद ऋषि। जगती छन्दः। ग्रावस्तुति। ८-"सुखं रथं युयुजे"। सिन्धुक्षित् नाम प्रियमेधस् का पुत्र ऋषि। जगती छन्दः। नदी की स्तुति। ९-"एते वदन्ति०-०"होतुश्चित्०"। वही ऋचा (अ० ७, पा० १, खं. ३)