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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( ४२ ) ७ अ० २ पा० ३ खं० रूप में सदा पुरुषाकार रहता है, और अग्नि, वायु आदि कर्म रूपों से सदा ही अपुरुषाकार रहता है। इनमें तीसरा यास्कमत और चौथा आख्यानमत है ही। इति हिन्दीनिरुक्ते सप्तमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥७ (२)॥ (खंड २) १- "ऋष्वात इन्द्र०"। शंयु ऋषि। त्रिष्टुप् छन्दः। इन्द्र देवता। एकादशिनी में इन्द्र के पशुकी याज्या। २- "यत्तसंगृभ्णा०" की व्याख्या हो चुकी (अ० ६ पा० १ खं० २)। ३- " आद्वाभ्यां० " गृतसमद ऋषि। इन्द्र देवता। त्रिष्टप् छन्दः। ४- "अपाःसोम ०"-० कल्याणीर्जाया" विश्वामित्र ऋषि। त्रिष्टुप् छन्दः। हारियोजन की अनुवाक्या। ५- " इदं हविर्मघवन्०-०"अद्धीन्द्र पिब च"। अग्नियुत नाम स्थूरपुत्र ऋषि। त्रिष्टुप् छन्दः। इन्द्र देवता। ६- "आश्रुत्कर्ण"मधुच्छन्दस् ऋषि। अनुष्टुप् छन्दः। इन्द्र देवता। ( खं० ३ ) ७-"एते वदन्ति०-०अभिक्रन्दन्ति०" अर्बुद ऋषि। जगती छन्दः। ग्रावस्तुति। ८-"सुखं रथं युयुजे"। सिन्धुक्षित् नाम प्रियमेधस् का पुत्र ऋषि। जगती छन्दः। नदी की स्तुति। ९-"एते वदन्ति०-०"होतुश्चित्०"। वही ऋचा (अ० ७, पा० १, खं. ३)

हिन्दी निरुक्त (४३) ७ अ० ३ पा० १ खं० तृतीयः पादः। (खं० १) (निरु०-) तिस्रएव देवता इत्युक्तं पुरस्तात् । तासां भक्तिसाहचर्यं व्याख्यास्यामः ॥ अथ एतानि अग्निभक्तीनि-अयं लोकः, प्रातः सवनं, वसन्तो, गायत्री, त्रिवृत्स्तोमो, रथन्तरं साम, ये च देवगणाः समाम्नाताः प्रथमे स्थाने, अग्नायी, पृथिवी, इला,-इति स्त्रियः । अथ अस्य कर्म-वहनं च हविषाम्, आवाहनं च देवतानां, यच्च किंचिद् दार्ष्टिविषयिकम् अग्नि कर्मैव तत्। अथ अस्य संस्ताविका देवाः-इन्द्रः, सोमो, वरुणः, पर्जन्यः, ऋतवः । आग्नावैष्णवं च हविः, नतु- ऋक् संस्ताविकी दशतयीषु विद्यते । अथापि आ- ग्नापौष्णं हविः, नतु संस्तवः, तत्र एतां विभक्ति- स्तुतिम् ऋचम् उदाहरन्ति- ॥ १ (८) ॥ अर्थ :-तीन ही देवता हैं, यह पहिले कहा गया है। उन देवताओं के भक्ति साहचर्य (जो २ उनका भाग है, और उनके साथ रहता है) को व्याख्यान करेंगे; “अथ०” यहां से ये अग्नि के भाग हैं,-अग्नि की निज की वस्तुएं हैं. इन से अग्नि का नित्य संबन्ध है- जहां ये

हिन्दी निरुक्त ( ४४ ) ७ अ० ३ पा० १ खं०

वस्तुएं हैं, वहां अग्नि का संबन्ध रहता है- अग्नि का प्रत्यक्ष मान न रहने पर भी, वहां अग्नि समझा जाता है,- यही प्रयोजन भी इनके कहने का है कि- इनका और अग्नि का संबन्ध उजाल होजावे या प्रकट हो जावे । [ वे कौन ?- ] “अयं लोक०”। यह लोक-पृथिवी लोक । प्रातःसवन । वसन्त ऋतु । गायत्री छन्द । त्रिवृत् स्तोम । रथन्तर साम । और जो देवगण प्रथम स्थान ( नि० अ० ५ खं० १-२-३ ) में गिनाए हैं । अग्नायी, पृथिवी, इळा, ये स्त्रियें । अब इसका कर्म-हवियों का वहन-देवताओं के पास पहुंचाना । और देवताओं का आवाहन = बुलाना । और जो कुछ दृष्टि सम्ब- न्धि विषय है, वह अग्नि का ही कर्म है । अब इस के संस्त- विक देवता हैं-जिन के साथ इस (अग्नि) की स्तुति होती है ।—इन्द्र, सोम, वरुण, पर्जन्य और ऋतुएं । और आग्ना- वैष्णव हवि है, किन्तु दश मंडल ऋग्वेद में साथ स्तुति की ऋचा नहीं है—अग्नि देव विष्णु के साथ हविः का भोजन तो करते हैं, पर किसी ऋचा में एक साथ स्तुति नहीं सुनते । देवताओं में सन्मान के ये दो अधिकार हैं- सहभोजन और सहस्तवन, इन में से कोई एक अधिकार पा जाता है और कोई दोनों को भी,-इसी प्रकार पृथिवी लोक के ईश्वर अग्नि देव के यहां विष्णु देवता सहभोज का अधिकार पाए हुये हैं, किन्तु एक साथ एक ऋचा में स्तुति का नहीं । और भी आग्नापौष्ण-अग्नि और पूषाका हविः है, किन्तु संस्तव नहीं । तहां एक अलग स्तुति की ऋचा उदाहरण देते हैं-जिस एक ही ऋचा में अलग २ वाक्यों से दोनों की स्तुति है-ऋचा तो एक ही है पर स्तुति क्रम से अलग २ होती है-॥१(८)॥

हिन्दी निरुक्त ( ४५ ) ७ अ० ३ पा० २ खं० ( खं० २ ) (निरु०-) “पूषा त्वेतश्च्यावयतु प्रविद्वाननष्ट पशु भुवनस्य गोपाः । सत्वैतेभ्यः परिददत् पितृभ्योऽ- ग्निद्देवेभ्यः सुविदत्रियेभ्यः ॥” [ऋ०सं०७,३,२३,३] पूषा त्वा इतः प्रच्यावयतु, विद्वान् अनष्टपशुः भुवनस्य गोपाः इति एष हि सर्वेषां भूतानाम् गोपायिता आदित्यः “सत्वैतेभ्यः परिददत् पि- तृभ्यः”-इति सांशयिकस्तृतीयः पादः । ‘पूषा’ पुरस्तात्, तस्य अन्वादेशः-इति एकम्। ‘अग्निः’ उपरिष्टात्, तस्य प्रकीर्त्तना-इति अपरम् “अग्निद्देवेभ्यः सुविदत्रियेभ्यः” । सुविदत्रं धनं भवति । विन्दतेर्वा एकोपसर्गात् । दयतेर्वास्याद् द्व्युपसर्गात् ॥ २ (९) ॥ अर्थः-“पूषात्वेतः” इस ऋचा का देवश्रवस् यामायन (यम का पुत्र) ऋषि, त्रिष्टुप् छन्दः, और शव (मुर्दे) के कान में प्रमीत (प्रेत) के अनुमन्त्रण में विनियोग है । उस प्रेत से कहा जाता है- ‘पूषा’ भगवान् आदित्य (मार्गों का अधिपति) ‘त्वा’ तुझे ‘इतः’ (मनुष्यलोकात्) इस मनुष्य लोक से (विशेष मार्ग के द्वारा) ‘प्रच्यावयतु’ हटावे या ले जावे, ‘विद्वान्’ जो आदित्य देव विद्वान् है-उसका ज्ञान किसी विषय में रुकता नहीं है-

हिन्दी निरुक्तं ( ४६ ) ७ अ० ३ पा० २ खंड कोई ऐसा विषय नहीं जिसे वह अच्छी तरह न समझ सकें इसी से उस के प्रबन्ध में तुझे जाने से लाभ ही हो सकता है, हानि नहीं, 'अनष्टपशुः' इसी से उसका पशु नष्ट नहीं होता उसकी पूजा बन्ध नहीं होती ( जो अपने काम को भले प्रकार जानने वाला होता है, और अपने कर्तव्य को ठीक पालन करता रहता है, उसका काम कभी बन्ध नहीं होता ।) ' भुवनस्य गोपाः ' और प्राणिमात्रका गोपायिता = रक्षक है, 'सः' वह ऐसा पूषा देव 'त्वा' तुझे ( यहाँ से लेजाकर ) 'एतेभ्यः' ( चन्द्रमण्डलोपान्तंवासिभ्यः) इन चन्द्रमण्डल के पास रहने वाले 'पितृभ्यः' पितरों के लिये 'परिददत्' (परि- ददातु ) देदेवे । [ सो कहा भी है- “दक्षिणायनात् पितृ- लोकम् ” सूर्य के दक्षिणायन कालमें पितृ लोक को जाता है । ] 'अग्निः' और अग्नि देव भी 'सुविद्रियेभ्यः' धनवाले 'देवेभ्यः' देवताओं के लिये, -पितृलोक से हटाकर तुझे देव लोक में पहुंचा देवे ॥ “सत्वैतेभ्यः परिददत् पितृभ्यः ” यह तीसरा पाद संशय युक्त है । क्यों ? 'पूषा पुरस्तात् ” पूषा पहिले ( पूर्वार्द्ध में ) कहा गया है, उसीका ' सः ' पदसे यहां अनु- स्मरण है । यह एक मत हैं । इसके अनुसार मन्त्र में व्याख्या दिखाई जा चुकी है । “ अग्निरुपरिष्टात्० ” अग्नि आगे ( चतुर्थपाद में ) कहा गया है, उसी का ' सः ' पदसे कथन है । इस मत में तीसरे और चौथे पाद को यों अर्थ होता है-'सः' वह 'अग्निः'

हिन्दी निरुक्त ( ४७ ) ७ अ० ३ पा० २ खं० अग्नि 'एतेभ्यः पितृभ्यः' इन पितरों से “सुविदत्रियेभ्यः देवेभ्यः परिददत् ” धनवान् देवताओं के लिये देदेवे, किन्तु पितरों ( प्रेतों ) के लिये नहीं ॥ आदित्य 'गोपा' क्यों ? “ एष हि सर्वेषां भूतानां गोपायिता” जिससे कि-यह सब भूतों का गोपायिता ( रक्षक ) है । 'सुविदत्र' क्या ? धन होता है । कैसे ? प्राप्ति अर्थ में एक उपसर्ग ( सु ) सहित 'विद्' ( तु० उ० ) से । अथवा दो उप- सर्ग ( सु-वि ) सहित दान अर्थ में 'दा' ( जु० उ० ) धातु से हैं । क्योंकि-वह सुन्दर प्रकार से विशेष करके दिया जाता है । [ यह 'सुविदत्र' ( धन ) जिनके होता है, वे ' सुविदत्रिय ' कहाते हैं । ] ॥ २ ( ६ ) ॥ व्याख्या । इस पाद के प्रथम और द्वितीय खण्ड में अग्नि का भक्ति साहचर्य दिखाया गया है, कि-उसके सम्बन्धी कौन २ पदार्थ हैं, जो अग्नि की स्तुतिमें मन्त्रों में प्रायः आते हैं । लोक, सवन, ऋतु, छन्द, स्तोम, साम, देवगण, स्त्रियं और कर्म ये सब स्पष्ट हैं । संस्तव से प्रयोजन ऐसी ऋचासे है, जिस में किसी दूसरे देवता के साथ अग्नि की स्तुति हो, जब कि- वह ऋचा हविःमें विनियोग न कीगई हो । यदि हविः में विनियुक्त हो, तो वह साध स्तुति ( संस्तव ) वाली भी क्यों नहो, हविः की ही समझी जावेगी । जैसे अग्नि के इन्द्र, सोम आदि देव संस्तविक बताए हैं, इन में “ अग्ने इन्द्रश्च दाशुषो

हिन्दी निरुक्त ( ४८ ) ७ अ० २ पा० ३ खं० दुरोणे० " [ ऋ० सं० ३, १,२५, ४ ] यह ऋचा इन्द्र के साथ अग्नि के संस्तव की है। "अग्नीषोमाविमं सुमे०" [ ऋ० सं० १,६, २८, १ ] यह ऋचा सोमके साथ अग्नि की स्तुति की है। “आग्नावैष्णवं हविः "। यह भी देवता का एक स्वभाव है। अग्नि देव विष्णुदेव के साथ हविः के भागी होते हैं- "अग्नाविष्णू सजोषसा वर्द्धन्तु वां गिरः" इस ऋचा का वामदेव ऋषि, गायत्री छन्दः, और आग्ना वैष्णव (अग्नि विष्णु के) हविः में विनियोग है, इस ऋचा में यद्यपि विष्णु के साथ अग्नि की स्तुति है, किन्तु इस का हविः में विनियोग है, इस से यह संस्तविकी नहीं है, हविः की ही है। “आग्नापौष्णं हवि ! ०" पूषा के साथ भी अग्नि का हविः ही है, संस्तव नहीं। वह ऋचा "पूषात्वेतश्च्या- वयतु०" (ऋ०सं० १, ६, २३, ३) यह है। इस एक ही ऋचामें अग्नि और पूषा दोनों की स्तुति है,परन्तु भिन्न २ वाक्यों में है और उनका कार्य भी भिन्न २ ही है। अर्थात्- पूषा मृत को इस लोक से अलग करता है, और अग्नि उसे देव लोक में पहुंचाता है यही पूर्व हविः से इस हविः में विलक्षणता है। वहां अग्नि और विष्णु दोनों का एक संबोधन और वाणी की वृद्धि रूप एक कार्य है॥ २ (६) ॥ ( खं० ३ ) (निरु०-) अथैतानि इन्द्रभक्तीनि- अन्तरिक्ष-

लोको, माध्यन्दिनं सवनं, ग्रीष्मः, त्रिष्टुप्, पञ्चदश- स्तोमः, बृहतसाम, ये च देवगणाः समाम्नाता मध्यमे स्थाने, याश्च स्त्रियः, अथास्य कर्म-रसानुप्रदानं, वृत्र- वधः, याच काच बलकृतिः, -इन्द्रकर्म एवतत्। अथा- स्य संस्तविका देवाः अग्निः, सोमः, वरुणः, पूषा, बृह- स्पतिः, ब्रह्मणस्पति, पर्वतः, कुत्सः विष्णुः, वायुः। अथापि मित्रो वरुणेन संस्तूयते, पूष्णा रुद्रेण च सोमः, अग्निना च पूषा, वातेन च पर्जन्यः ॥३(१०)॥ अर्थ :- अब ये इन्द्रकी भक्ति (भाग) हैं- अन्तरिक्ष लोक, माध्यन्दिन सवन, ग्रीष्म ऋतु, त्रिष्टुप् छन्दः, पञ्चदश स्तोम, बृहत् साम, और जो देवगण मध्यम स्थान पे समाम्नान (परिगणन) किये हैं, और जो स्त्रियें। अब इसका कर्म- जल बरसना, वृत्रका वध, और जो कोई बलकृति (बलकर्म) वह इन्द्रका ही कर्म है। अब इसके संस्तविक देव-अग्नि, सोम, वरुण, पूषा, बृहस्पति, ब्रह्मणस्पति, पर्वत, कुत्स, विष्णु, वायु, हैं। और भी मित्र वरुण के साथ स्तुति किया जाता है, पूषा और रुद्र के साथ सोम, और अग्नि के साथ पूषा और वात के साथ पर्जन्य स्तुति किया जाता है ॥३ (१०)॥ व्याख्या यह इन्द्र भक्ति का खण्ड है। इस में और देवता का प्रसंग न आना चाहिये, तथापि मित्र आदि देवताओं के संस्तविक देवता बताये हैं, यह याज्ञक मत के अनुसार दिखाये हैं, । नैरुक्तों के मत में तीन देवताओं के अतिरिक्त अन्य देवता नहीं है और न किसी का संस्तविक देवता ही है सुतराम् व्युत्पत्ति के लिये मतान्तर दिखाया गया है ॥३(१०)॥ (खं० ४) (निरु०-) अथैतानि आदित्यभक्तीनि-असौ लोकः, तृतीयसवनं, वर्षा, जगती, सप्तदशस्तोमः, वैरूपंसाम,

हिन्दी निरुक्त ( ५० ) ७ अ० ३ पा० ५ खं० येच देवगणाः समाम्नाताः उत्तमे स्थाने, याश्च स्त्रियः। अथास्य कर्म-रसादानं रश्मिभिश्च रसधारणं, यच्च किञ्चित्प्रबर्हितम्,-आदित्यकर्मैव तत्। चन्द्रमसा, वायुना संवत्सरेण इति संस्तवः ॥ ४ ॥ अर्थ:- अब ये आदित्य के भक्ति (भाग) हैं— वोह (तीसरा) लोक, तीसरा सवन, वर्षा ऋतु, जगती छन्दः, सप्तदशस्तोम, वैरूप साम, और जो देवगण उत्तम स्थान में समाम्नान किये है, और जो स्त्रियें। अब इसका कर्म है— रस का आदान (लेना) रश्मियों (किरणों) से धारण करना, और जो कुछ ⁜ प्रबर्हित (गुप्त अर्थ) वह सब आदित्य का ही कर्म है। चन्द्रमा से, वायु से, संवत्सर से संस्तव है ॥४॥ ( खं० ५ ) (निरु०-) एतेष्वेव स्थानव्यूहेषु ऋतुच्छन्दः स्तोम- पृष्ठस्य भक्तिशेषम् अनुकल्पयात्-शरद् अनुष्टुब्, एकविंशस्तोमः, वैराजं साम, इतिपृथिव्यायतनानि। हेमन्तः, पङ्क्तिः, त्रिणवस्तोमः, शाक्करं साम,- इति अन्तरिक्षायतनानि। शिशिरः, अतिच्छन्दाः त्रयस्त्रिंशस्तोमः, रैवतं साम-इति द्युभक्तीनि।५(११)। अर्थ :- इन्हीं (पृथिवी आदि) स्थानों के वर्गों में (शेष-) ऋतु, छन्दः, स्तोम और पृष्ठ (साम) का भक्ति शेष (भागशेष) समझना या मानना। (जैसे-) शरद् ऋतु अनुष्टुप् छन्दः, एक- विंशस्तोम, वैराजसाम, ये पृथिवी स्थान के या अग्नि के भक्ति हैं। हेमन्त ऋतु, पङ्क्ति छन्दः, त्रिणवस्तोम, और शाक्कर साम, ये अन्तरिक्ष स्थान के या इन्द्रके भक्ति हैं। शिशिर ऋतु, अतिच्छन्दः, त्रयस्त्रिंश स्तोम, और रैवत साम, ये द्युलोक की भक्ति हैं॥ ५ (११) ॥ 'अनभिव्यक्तिविशिष्टौ वाक्यार्थः प्रवर्हितम्' (भग०)

हिन्दी निरुक्त ( ५२ ) ७ अ० ३ पा० ६ खं० ( खं० ६ ) [निरु०] ‘मन्त्राः’ मननात् । ‘छन्दांसि’ छादनात् । ‘यजुः’ यजतेः । ‘साम’ संमितम्-ऋचा, अस्यतेर्वा (स्य- तेर्वा ऋचा समं मेने इति नैदानाः । ‘गायत्री’ गायतेः स्तुतिकर्मणः, त्रि- गमना, विपरीता, गायतो मुखाद्— उदपतत्-इति च ब्राह्मणम् । अर्थ :- ‘मन्त्र’ क्यों ? मनन से । [ क्योंकि-उनसे अध्या- त्म, अधिदैव, अधियज्ञ आदि अर्थ को मनन (ध्यान) किया जाता है । ] ‘छन्दस्’ (छन्द) क्यों ? छादन (ढांपने) से । [ क्योंकि- मृत्यु से डरते हुये देवताओं ने इन से अपने को ढांपा था, यही इन छन्दों का छन्दपना है, यह ब्राह्मणश्रुति से जाना जाता है । ] ‘यजुः’ क्यों ? पूजा अर्थ में ‘यज’ (स्वा०उ०) धातु से है। [ क्यों कि उससे विशेष करके यजन किया जाता है । ] ‘साम’ क्यों? ‘सम्मितम् ऋचा’ ऋचा के समान है-जितनी ऋचा होती है-उतना ही परिमाण से होता है । अथवा क्षेपण (फेंकना) अर्थ में ‘अस्’ (दि०प०) धातु से है । [ क्यों कि-वह ऋचा में फेंका हुआ ( डाला हुआ ) जैसा होता है- ऋचा ही गान की हुई साम हो जाता है । ] अथवा ‘सो’

हिन्दी निरुक्त ( ५३ ) ७ अ० ३ पा० ७ खं० अन्तकर्मणि (दि०प०) धातु से है। [क्योंकि-वह अन्न का कर्म होता है, पहिले संहिता (पाठ) फिर पद ( पाठ ) फिर साम (पाठ) ।] अथवा “ऋचा समं मेने” ऋचाके समान माना गया, इस से 'साम' है। ऐसा “निदान” ग्रन्थ के जानने वाले मानते हैं । 'गायत्री' कैसे ? स्तुति अर्थ में 'गै' (भ्वा० प०) धातु से है। [क्योंकि-उससे देवता स्तुति किये जाते हैं।] अथवा 'त्रिगमना' तीन प्रकार की गति वाली होने से 'गायत्री' है। “गाते हुये ब्रह्मा के मुख से उड़ी” यह ब्राह्मण है ॥६॥ (खं० ७) (निरु०-) 'उष्णिक्' उत्स्नाता भवति । स्निह्यते र्वा स्यात् कान्तिकर्मणः । उष्णीषिणीवा-इति औपमिकम् । 'उष्णीषम्' स्नायतेः । 'ककुप्' ककुभिनी भवति । 'ककुप्' च कुब्जश्च कुजतेर्वा, उब्जतेर्वा । 'अनुष्टुप्' अनुष्टोभनात् । "गायत्रीमेव त्रिप- दां सतीं चतुर्थेन पादेन अनुष्टोभति-इति च ब्राह्मणम् ॥ ७ ॥ अर्थः-'उष्णिक्' क्यों ? वह उत्स्नाता होती है-गायत्री से चार अक्षरों से अधिक लिपटी हुई होती है। अथवा कान्ति अर्थ में 'स्निह्' (दि०प०) धातु से है। (क्योंकि-यह देवता-

हिन्दी निरुक्त ( ५४ ) ७ अ० ३ पा० ७ खं० ओं को (स्निग्ध प्यारा) छन्द है) अथवा यह उष्णीषिणी (पगड़ी वाली) जैसी होती है, इससे 'उष्णिक्' है। यह औपमिक (उपमा के साथ) नाम है। 'उष्णीष' (पगड़ी) कैसे ? शुद्धि अर्थ में 'स्नै' (भ्वा० प०) धातु से है । (क्योंकि- वह शुद्ध (धोई हुई = सफेद होती है) । 'ककुप्' (छन्द) क्यों ? 'ककुभिनी इव भवति' थूही वाली जैसी होती है-पूर्वोक्त सप्ताक्षर पाद वाली उष्णिक् के मध्य में जगती छन्द का बारह (१२) अक्षरों का पाद बीच में गिरा हुआ रहता है, इससे वह बीच में मोटी हो जाने से थूही वाली जैसी प्रतीत होती है। (यह नाम भी ककुभ (थूही) की उपमा से बना है)। 'ककुभ्' और 'कुब्ज' शब्द दोनों कौटिल्य अर्थ में 'कुज' (तु० प०) धातुसे हैं। (क्योंकि-वे (थूही और कुबड़ा) टेढ़े होते हैं।) अथवा न्यग्भाव या झुकना अर्थ में 'उब्ज' (भ्वा०प०) धातु से हैं। (क्योंकि-वे झुके हुये जैसे होते हैं।) 'अनुष्टुभ्' (अनुष्टुप् छन्द) क्यों ? अनुष्टोभन (थांभने) से। (क्योंकि) गायत्री को ही त्रिपदा (तीन पाद वाली) होती हुई को चौथे पाद से थांभलेती है = ठहरालेती है- गायत्री छन्द चौबीस (२४) अक्षरों का होता है, उसमें अनुष्टुप् के आठ (८) अक्षरों के तीन ही पाद बनते हैं, उसी में आठ (८) अक्षरों का एक पाद बढ़ने से बत्तीस अक्षरों का अनुष्टुप् छन्द होता है। इस गणना से तीसरे पाद पर गायत्री छन्द गिरजाता है और अनुष्टुप् छन्द उसमें चौथा

हिन्दी निरुक्त    ( ५५ )    ७ अ० ३ पा० ८ खं० पाद पूरा करके मानों उसे थांभलेता है । इसी से यह अनुष्टुभ् है, यह ब्राह्मण है ॥ ७ ॥ ( खं० ८ ) ( निरु०- ) ' बृहती ' परिवर्हणात् । 'पङ्क्तिः' पञ्चपदा । 'त्रिष्टुप्' स्तोभत्युत्तरपदा । का तु त्रिता स्यात् ? तीर्णतमं छन्दः । त्रिवृद् वज्रः, तस्य स्तोभाति इति वा । “यत् त्रिरस्तोभत् तत् त्रिष्टुभ स्त्रिष्टु- प्वम्-” इति विज्ञायते ॥ ८ ( १२ ) ॥ अर्थः- 'बृहती' क्यों ? परिवर्हण ( वृद्धि ) से । ( क्योंकि वह अनुष्टुप् छन्द की अपेक्षा से चार अक्षरों से बढी हुई होती है । ) 'पङ्क्ति' ( छन्द ) क्यों ? ' पञ्चपदा ' । वह पांचपाद वाली होती है-क्योंकि उसके चारों पाद दश २ अक्षरों के होते हैं-कुल चालीस ( ४० ) अक्षर होते हैं, उनमें अष्टाक्षरपाद अनुष्टुप् के पांच पाद बनजाते हैं, इसी से वह पञ्चपदा हो कर ' पङ्क्ति' होगई ! 'त्रिष्टुप्' कैसे ? “ स्तोभत्युत्तरो ” इसका ' स्तुभ् ' ( स्वा० प० ) उत्तर पद है-पहिला पद ' त्रि ' और दूसरा 'स्तुभ् ' धातु । किन्तु त्रिता ( त्रित्व ) क्या । “ तीर्णतमं छन्दः ” बहुत ही प्रशंसा किया गया छन्द । क्योंकि-यह तीर्णतम = स्तुततम है और गायत्री छन्द को स्तोभन करता

हिन्दी निरुक्त ( ५६ ) ७ अ० ३ पा० ६ खं० है (ठहरता है) इस से 'त्रिष्टुप्' है । अथवा 'त्रिवृद्' तीन धारवाला वज्र होता है, उसको स्तोभन (स्तुति) करता है, इससे 'त्रिष्टुप्' है । “यत् त्रि०” 'जिससे कि-इसने तीन वार स्तुति की है, वह त्रिष्टुभ्‌का त्रिष्टुभ् पना है' यह ब्राह्मण श्रुति में जाना जाता है ॥ ८ (१९) ॥ ( खं० ६ ) ( निरु०- ) 'जगती' गततमं छन्दः । जल- चरगति र्वा । “ जल्गल्यमानोऽसृजत ” इति च ब्राह्मणम् । 'विराट्' विराजनाद् वा । विराधनाद् वा । विप्रापणाद् वा । विराजनात् सम्पूर्णाक्षरा । विराधनाद् ऊनाक्षरा । विप्रापणाद् अधिकाक्षरा । 'पिपीलिकमध्या'-इति औपमिकम् । 'पिपीलिका' पेलतेर्गतिकर्मणः ॥ ९ ॥ अर्थ:-'जगती' क्या ? गततम (बिलकुल गयां हुआ) छन्द । [क्यों ? वह सब छन्दों से अन्त का छन्द है, इससे पर छन्द नहीं, किन्तु अतिच्छन्द हैं ।) अथवा जलचरगति होने से 'जगती' है । (क्योंकि-उसका प्रस्तार जलकी लहरियों जैसा होता है । ] “ जल्गल्यमानो० ” प्रजापति ने इसे जल- गल्यमान ( क्षीण हर्ष) होते हुए रचा है या देखा है (क्योंकि- छन्द नित्य हैं, उनकी रचना का संभव नहीं इससे 'सृज' का दर्शन अर्थ ही संभव होता हैं ।) यह ब्राह्मण है :

हिन्दी निरुक्त ( ५७ ) ७ अ० ३ पा० १० खं० 'विराट्' क्यों ? विराजन ( विशेष शोभन ) होने से, अथवा विराधन ( विकल ) होने से । अथवा विपापणा (बढने- से) । सम्पूर्ण अक्षर वाली होने से विराजमान है । अल्प अक्षर वाली होनेसे विकल है । अधिकाक्षर होने से विप्लुता उछली हुई जैसी । 'पिपीलिकमध्या' यह नाम उपमांसे है। पिपीलिका (चींटी) के समान आकार वाली होती है । 'पिपीलिका' कैसे ? गति अर्थ में पेल, ( भ्वा. प० ( धातुसे है । [क्योंकि- वह चलती ही रहती है ।]॥ ९ ॥ (खं० १०) (निरु०-) इति- इमा देवता अनुक्रान्ताः- सूक्तभाजः, हविर्भाजः, ऋग्भाजश्च भूयिष्ठाः। का- श्चिन्निपातभाजः । अथोत अभिधानैः संयुज्य हविश्चो दयति-इन्द्राय वृत्रघ्ने, इन्द्राय वृत्रतुरे, इन्द्राय अंहोमुचे-इति । तान्यपि एके समामनन्ति । भूयांसि तु समा- म्नानात् । यत्तु संविज्जानभूतं स्यात् प्राधान्यस्तुति तत् समामने । अथोत कर्मभिर्ऋषिर्देवताः स्तौति-वृत्रहा, पुरन्दर इति, तान्यपि एके समामनन्ति । भूयां सि तु समाम्नानात् । व्यञ्जनमात्रं तु तत् तस्या-

हिन्दी निरुक्त ( ५८ ) ७ अ० ३ पा० १० खं०

भिधानस्य भवति । यथा-ब्राह्मणाय बुभुक्षिताय ओदनं देहि, स्नाताय अनुलेपनं, पिपासते पानी- यम्- इति ॥ १० ( १३ ) ॥ इति सप्तमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ७, ३॥ अर्थ:- “इति इमा०” । इस प्रकार ये देवता अनुक्रम से कहे गए-जिनमें कोई सूक्तभाक् = सूक्तों को भजने वाले-सूक्तों में जिनकी प्राधान्य से स्तुति होती है, परन्तु हविः उनको नहीं दी जाती, कोई हविर्भाक् = हविः को भजने वाले = जिनको हविः दी जाती है, या देना विहित है, “ऋग्भाजश्च भूयिष्ठाः” और बहुत से ऋचाओं के भजने वाले हैं-जिनकी एक २ ऋचा में (या आधी २ ऋचा में या चौथाई १ ऋचामें ) स्तुति होती है, किन्तु सूक्तों में नहीं ऐसे बहुत ही देवता हैं । ( सूक्त अनेक मन्त्रों का समूह होता है । ) । और कुछ देवता निपात के भजन करने वाले हैं-- उनकी कहीं सूक्त, मन्त्र, या आधी ऋचा में प्राधान्य से स्तुति नहीं वे सदा दूसरे प्रधान देवताओं की स्तुति में गौण रूप से आते हैं, या उनके मन्त्रों में उनके साथ स्तुति किये जाते हैं ॥ समाम्नाय के समाम्नान (संग्रह) के विषयमें “अथोत अभिधानैः” और भी अभिधानों के साथ विशेषण शब्दों को संयुक्त करके विधिशास्त्र ) हविः का विधान करता है- “इन्द्राय वृत्रघ्ने” (एकादशकपालं निर्वपेत् ) वृत्र के हनन करने वाले इन्द्र के लिये ग्यारह कपालों में पकाये हुए पुरोडाश को देवे । इन्द्राय वृत्रतुरे”

वृत्रतुर् (वृत्र को भगाने वाले) इन्द्र के लिये "इन्द्राय— अंहोमुचे" पाप को छुड़ाने वाले इन्द्र के लिये ( एकादश- कपालं निर्वपेत् ) ग्यारह कपालों के पुरोडाश को देवे । "तान्यपि०" उनको भी कोई ( आचार्य ) समाम्नान करते हैं- निघण्टु शास्त्र में पढ़ते हैं- देवताओं के इन्द्र आदि प्रधान नामों के समान उनके विशेषण 'वृत्रहन्' 'वृत्रतुर्' और 'अंहोमुच्', आदि शब्दों को भी निघण्टु में संग्रह करते हैं ! "भूयांसि तु समाम्नानात्" किन्तु (उनके) समाम्नान करने से बहुत नाम हो जावेंगे ? "यत्तत्संविज्ञानभूतं" मैं तो जो संविज्ञानभूत = प्रकृति, प्रत्यय आदि संस्कारों से बनाहुआ और प्रधान्य से स्तुति वाला नाम है, उसे समाम्नान करता हूं । "अथोत०" और भी ऋषि कर्मों से देवताओं की स्तुति करता है-'वृत्रहा' वृत्र को मारने वाला, 'पुरन्दर' पुर दैत्य को मारने वाला, (इत्यादि ।) उनको भी (कर्मनामों = गौण नामों को भी) कोई आचार्य समाम्नान करते हैं । "भूयांसि तु समाम्नानात्" किन्तु (उनके) समा- म्नान से बहुत हो जावेंगे । "व्यञ्जनमात्रन्तु०" वह तो विशेषणमात्र है-उस (प्रधान) नाम का । जैसे बुभुक्षित (भूखे) ब्राह्मण के लिये भात दे, नहाए के लिये अनुलेपन (चन्दन) प्यासे के लिये पानी, यह, (यहां 'ब्राह्मण' इस प्रधान नाम के साथ 'बुभुक्षित' आदि नाम विशेषण हैं ।) ॥ १० (१३) ॥

हिन्दी निरुक्त ( ६० ) ७ अ० ३ पा० १० खं० व्याख्या । सप्तमाध्याय के आरम्भ से देवतातत्त्व के ही सम्बन्धमें विशेष २ अर्थों का निर्णय होता आया है । जैसे पहिले देव- ता का लक्षण कि किस पहिचान से मन्त्र में देवता समझा जावेगा । फिर जिन मन्त्रों में देवता ज्ञातव्य है उन मन्त्रों के परोक्ष, प्रत्यक्ष और आध्यात्मिक भेद बताए गए हैं, उन का भी प्रयोजन देवता का परिज्ञान ही है । क्योंकि भिन्न २ स्वभाव वाली ऋचाओं में भिन्न २ प्रकार से देवता रहता है, इससे उनके स्वभाव जाने बिना देवता परिज्ञानमें संकट उपस्थित हो सकता है। इसी प्रसंग में हीन लक्षण मन्त्र भी दिखाए, जिनमें कोई स्तुतिहीन है, कोई कामनाहीन है, कोई शापरूप है, और कोई शपथरूप है, इत्यादि । फिर अनादिष्ट मन्त्र अनेक मत भेदोंसे अनेक प्रकार के दिखाए हैं- जिनमें कोई देवता के चिन्ह से रहित होकर यज्ञ में सम्बन्ध करता है, कोई यज्ञाङ्ग में सम्बन्ध करता है, कोई दोनों में सम्बन्ध नहीं करता, उनमें यज्ञ देवता, यज्ञाङ्ग देवता, यज्ञ से अन्यत्र याज्ञिकों के मत में 'प्रजापति' देवता, नैरुक्तों के मत में 'नराशंस' देवता अथवा इच्छित देवता, अथवा अधि- कृत देवता, अथवा विश्वदेवता, अथवा यज्ञ देवता (आदित्य देवता) अथवा अग्नि देवता इत्यादि रूप से निर्णय किया है फिर अदेवताओं को देवताओं के समान स्तुति का आक्षेप और उसका देवता के माहाभाग्य आदि हेतुओं से प्रतिसमा- धान, फिर देवताओं की संख्या के सम्बन्ध में नैरुक्तों के मत में त्रित्व और याजकों के मत प्रतिनाम देवता का भेद (और आत्मवित् के मत में एक आत्मा देवता) स्थापन

हिन्दी निरुक्त ( ६१ ) ७ अ० ३ पा० १० सं० किया, तथा “एतन्नरराष्ट्रमिव” इस दृष्टान्त से सब पक्षों की गौण मुख्य भाव से एकवाक्यता सिद्ध की है। फिर देवताओं के आकार का प्रश्न, जिसमें पुरुषाकारता, अपुरुषा- कारता, कर्मार्थ आत्मा की उभयविधता, और नित्य उभय- विधता रूपमे चार प्रकार के आकारों की मन्त्रप्रामाण्य से व्य- वस्था दी है। फिर देवताओं का नैरुक्तों के मतसे भक्तिसाहचर्य विस्तारसे निरूपण किया है। फिर 'मन्त्र' 'छन्दस्' 'यजुः' 'साम' और 'गायत्री' आदि शब्दोंके निर्वचनसे मन्त्रों के सामान्य विशेष स्वभाव दिखाये हैं फिर अब इस खण्डमें इस दैवतकाण्ड के उपोद्घात को पूरा करते हैं और जो कुछ देवता सम्बन्ध में अवशिष्ट है, संक्षेप से कहदेते हैं, इसी बात की सूचना के लिये खण्ड के आरम्भ में “इति इमाः” 'इति' शब्द दिया है। अथवा पूर्वोक्त प्रकार की सूचना के लिये यह 'इति' शब्द दिया है-जिस लक्षण जिस से, संख्या से, जिस आकार से ये देवता कहे गए हैं, वे सब देवता संक्षेपसे फिर चार प्रकार के हैं-सूक्तभाक्, हवि र्भाक्, ऋग्भाक्, और निपातभाक्। अर्थात्-इनस्वभावों को लेकर भी देवताओंका विभाग करना, ये स्वभाव भी सब के समान नहीं हैं। जो सूक्तभाक्-सूक्तों से स्तुति किये जाते हैं, उनका समूह अलग है, जो हविर्भाक् हैं, जिनको हविः दिया जाता है, वे अलग हैं, जो ऋग्भाक् (अर्द्धर्चभाग्, ऋक्पादभाक्) हैं, वे अलग हैं, किन्तु ये औरों की अपेक्षा से संख्या में बहुत अधिक हैं (जैसे धनाढ्य कम और अल्पधन अधिक होते हैं) और ऐसे ही कोई देवता ऐसे हैं, जो निपातभाक् हैं- दूसरों के स्तोत्र में गौण रूप से आते हैं। यह चौथा देवताओं का विभाग अलग

हिन्दी निरुक्त ( ६२ ) ७ अ० ३ पा० १० खं० है। जब देवता पदार्थ का विचार करना हो, तो और देव धर्मों के साथ में इन पर भी ध्यान रखा जावे निघण्टु की रचना यास्काचार्य्य इसी उपोद्घात में समाम्नाय या निघण्टु को अपने से पूर्वस्थिति को बता कर अपने स्वीकृत या परिष्कृत निघण्टु को भी देना आवश्यक समझते हैं। जिससे यह भी सूचित हो कि उन्होंने समाम्नाय पर भाष्य लिखकर ही इस शास्त्र का उपकार नहीं किया है, बल्कि- इस के मूल शरीर को उपयुक्त और लघु भी बना दिया है। जिस के कारण अध्येताओं को इस शास्त्र का अध्ययन सुगम और अल्पकालसाध्य होगया है। भाष्यकार कहते हैं— “ अथोत अभिधानैः० तान्यपि एके समामनन्ति, भूयांसि तु समाम्नानात्” जहां तहां विधिवाक्यों में देवताओं के प्रधान नामोंके साथ जो विशेषण शब्द दिये हैं, उन का भी कोई आचार्य्य समाम्नान करते हैं, किन्तु वैसे शब्दों के लेने से बहुत अधिक शब्द हो जाते हैं। और भी फिर कहते हैं- “अथोत कर्मभिः०- तान्यपि एके समामनन्ति, भूयांसि तु समाम्नानात्” कहीं २ मन्त्रों में ऋषि कर्मों से देवता की स्तुति करता है, जैसे 'वृत्रहा' 'पुरन्दर' इत्यादि, इन शब्दोंका भी कोई आचार्य्य अपने समाम्नाय में संग्रह करते हैं, किन्तु ऐसा करने से शब्द बहुत अधिक हो जावेंगे। सुतराम् यास्क अपने निघण्टु से पहिले दो प्रकार के निघण्टुओं को देख रहे हैं, उन दोनों