निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ हिन्दी निरुक्त । ८३ अथवा इसमें थोडा भी रमण स्थान नहीं है। और 'न च' यह 'इत्' इसके साथ अनुप्रश्न [दुबारा प्रश्न]में बोला जाता । [जैसे] “नचेत् सुरां पिबन्ति”। जो नहीं सुरा [मदिरा] पीते हुए होते । [कोई किसीसे पूछता है—'हैं शुद्र ? उत्तर—हैं । फिर प्रश्न— यदि हैं तो क्यो नहीं आते ? फिर उत्तर—'नचेत् सुरां पिवन्ति' यदि सुरा न पीते हुये होते तो आजाते । इस प्रकार विविध अर्थोंमें निपात गिरते हैं, सो देखने चाहिये ॥ ६ ॥ इति तृतीयः पादः ॥ द्वितीयपादकी विशेष व्याख्या । अथ निपाताः । उपमार्थकाः १—इव ( १ ) न ( २ ) चित् ( ३ ) नु ( ४ ) कर्मोप- सङ्ग्रहार्थाः २—च( १ ) आ ( २ ) वा ( ३ ) अह ( ४ ) ह ( ५ ) उ (६) हि ( ७ ) किल ( ८ ) [ निपात-समाहारौ—न किल, न-नु, किल ] मा ( ६ ) खलु ( १० ) शश्वत् ( ११ ) नूनम् ( १२ ) सीम् १३ सीमा ( १४ ) त्व ( १५ ) त्वत् ( १६ ) कम् ( १७ ) ईम् ( १८ ) इत् ( १६ ) उ ( २० ) इव ( २१ ) [ निपात-समाहारौ ]-नेत्-[ न-इत् ] नचेत्,- [ न-च-इत् ] पद-पूरणाः ३—कम् ( १ ) ईम् ( २ ) इत् ( ३ ) उ ( ४ ) [ कदाचित् ]-इव ( ५ ) प्रथमः खण्डः । ( १ )—उपमार्थक-निपात । इव, न चित् और नु ये चार निपात उपमार्थक हैं। ये चारों प्रायः अर्थवान् होते हैं, निरर्थक कहीं ही आते होंगे ।