भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 88

८८ अ० १ पा० २ ख० ३ । ५—"अहं च॒ त्वं च॑ वृत्रहन्त्सयु॒ज्याव॒ सनि॑भ्य॒ आ । अरा॑ती बाचिद- द्विवोऽनु॑नो मूर॒मंस॑ते भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑ ॥ [ऋ० सं० ६, ४, ४१, ५] घोरपुत्र प्रगाथ ऋषि । इन्द्र देवता । पंक्ति छन्द । इन्द्रके सखिभावको इच्छाने प्रगाथ ऋषि बोले कि 'हे इन्द्र ! मैं (प्रगाथ ) और तू दोनो एक प्रयोजनके लिये उसकी प्राप्ति तक संयुक्त हो जावें' । 'हे अद्रिव' ! ( इन्द्र ! ) हम दोनोंको इस प्रकारसे संयुक्त देखकर अदानशील या कृपण भी हमारे लिये अवश्य देनेको अनुमत होगा । ऐसा समझकर कि—'इन्द्रको देना कल्याणकारी है । प्रयोजन यह है कि—'कौन ऐसा है, जो इन तुम्हारे'संयोग होनेपर न देगा' । नोट—कभी यही समुच्चयार्थक चकार अलग हुए—हुए दोनों ही अर्थों के साथ संयुक्त होकर आता है, जैसा कि—इसी मन्त्रमें 'अहञ्च त्वंच' ॥ ६—"यो अ॒ग्निः क॒व्यवा॑हनः पि॒तॄन् यक्षदृता॒वृधः॑ । प्रेदु॑ ह॒व्यानि॑ वोचति दे॒वेभ्य॑श्च पि॒तृभ्य॒ आ ॥ [ऋ०स० ७, ६, २२, १] अनुष्टुप् छन्द । अग्नी-देवता । पितृयज्ञ॒अमें विनियोग । जो अग्नि कव्य (पित्रा अन्न) का प्रेरक है, अर्थात् जिसका यह अधिकार है, कि—वह कव्योंको प्रेरक, वह इस हमारे पितृयज्ञ॒अमें होताके रूपमें स्थित होकर पितरोंको पूजा करे, कि—जो पितर सत्य वा यज्ञजके बढ़ाने वाले हैं। तथा देवता और पितरोंको हमारे दिये हविषोंकी सूचना देवे । ७—ऐन्द्रलव ऋषि । गायत्री छन्द । लव कहता है कि—क्या मैं इस पृथ्वीको इस स्थानसे उठाकर इस अन्तरिक्ष लोकमें, या इस द्युलोकमें, या इस दाहिने कन्धे पर अथवा इस बांए' कन्धे पर रखूं । क्योंकि—मैंने अधिक सोमपान किया है, उस सोमपानके अनुरूप (समान) ही मुझमें ऐसा पराक्रम है । ८—"वायुर्वा॒ त्वा मनु॑र्वा॒ त्वा ग॑न्ध॒र्वाः स॒प्तविं॑शतिः । ते अग्रे॑ अश्व॑मयुञ्ज॒ंस्ते अ॒स्मिञ्जव॒माद॑धुः” [य० सं० ६, ७] अनुष्टुप् छन्द । वाजपेयमें अश्वके योजनमें विनियोग । 'हे अश्व ! वायु, मनु और सप्ताईस (२७) गन्धर्व देवता तुझे इस रथमें बांधते हैं'। क्योंकि वे जानते हैं, जिस प्रकार तू बांधने योग्य है। तथा इन्होंने देवताओं और ऋषियोंके अश्वको जो पहिले