निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ८७ २.--इसने यह किया है, यह कैसे कहता है कि "यह कैसे करेगा १।" ३-चक्रो न चक्रो. शूर बृहन् प्रते मङ्गा रिरिचे रोदस्यो । वृक्षस्य नु ते पुरुहूत वया व्यूतयो बभूविन्द्र पूर्व्वी ॥ [ ऋ० सं० ४, ६, १७, ३ ] बार्हस्पत्य भरद्वाजने इस त्रिष्टुप् छन्दके पूर्व्व अर्द्धर्च से इन्द्रकी स्तुति करके उत्तरार्द्ध से उसका उपालम्भ किया है । हे शूर ! इन्द्र ! पुरुहूत ! पृथ्वी और द्युलोकसे दो चक्रोंस महाम् घुरके समान तेरी बड़ी विभूति है, तेरे ऐसी विभूतिवालेके भक्त होने पर भी वृक्षकी शाखाओंके समान पुरानी हमारे यज्ञके आगमन मार्ग तेरे न आनेसे शून्य हैं। अहो खेद ! हमारे मन्दभाग बैठता है जिन हम लोगोंके पासकि-वह धन नहीं है जिससे तेरी पूजा करें, इसमें हम तुमको क्या कह सकते हैं ? ३-कोई निपात ऐसे होते हैं कि जो वाक्यमें सुने या बोले नभी जाव तो भी उन स्थानमें
- अध्याहारसे अपना अर्थ देते हैं उनका अर्थ अनेक पदार्थों का भेद दिखलाना ही है ऐसे निपातोंके स्थानके जाननेके लिये सदृश अथवा विरुद्ध शब्दोंका एकत्रत्व तथा चश्च का सामर्थ्य ही उपाय है, ऐसे निपात कर्मोपसङ्ग्रहार्थ कहलाते हैं । जैसे- देवदत्त यज्ञदत्तौ † = "देवदत्तश्च यज्ञदत्तश्च"
- वाक्यमे उसके अर्थ को पूर्ण करनेके लिये किसी बाह्य शब्दके ग्रहण करनेका नाम अध्याहार है । † यद्यपि यहाँ पर देवदत्त और यज्ञदत्त दोनों ही श्रवणके विषय होते हैं किन्तु उनका चौद्दिक (उच्चारण कृत ) पृथक्त्व नहीं है अर्थात् "गा, अश्वान्, पुरुषान्, पशून्" यहाँ प्रत्येक पदके उच्चारणसे ही उन पदार्थों का भेद प्रतीत होता है, किन्तु "देवदत्त- यज्ञदत्तौ, इन उदाहरणमें विवृद्धि या दोनों पदोंके अलग कर देने तथा च शब्दके आगम से पृथग्भाव प्रतीत होता है। तात्पर्य यह है कि जहाँ दो या बहुत अर्थों को मिश्रित करके एक क्रियामें उपसमावेश किया जाय वह कर्मोपसंग्रह होता है। जैसे-(देव- दत्त यज्ञदत्तौ पचेते) देवदत्त यज्ञदत्त पाक करते हैं। यहा एक ही पाक क्रियाम देवदत्त यज्ञदत्त दोनोंका समावेश है। इससे यह कर्मोपसंग्रह हुआ। अथवा 'अहञ्चत्वञ्च' ऐसा कहने पर अहञ्च भी दूसरा पदार्थ उपस्थिति प्रतीत होता है वह कर्मोपसंग्रह है। एवम् इस कर्मोपसंग्रह अर्थ में रहनेवाले निपात कर्मोपसंग्रहार्थ कहलाते हैं ।