भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 889

हिन्दी निरुक्त ( १२१ ) ७ अ० ७ पा० ६ खं० हुआ प्रकाश करता है। (६) “अथापि हविष्पान्तीयं सूक्तं सौर्यवैश्वानरं भवति” और भी सूर्य वैश्वानर का हवि- ष्पान्तीय सूक्त है। शाकपूणि आचार्य के मत से पार्थिव अग्नि ही वैश्वानर है, इस अर्थ की स्थापना— “अयमेव अग्नि वैश्वानरः इति शाकपूणिः” यही अग्नि वैश्वानर है, यह शाकपूणि मानते हैं। क्यों कि- [१] “विश्वानरौ एते०-० वैश्वानरोऽयम्” विश्वानर मध्यम उत्तम ज्योति हैं, यह अग्नि “वैश्वानर” है। क्यों कि यह उनसे उत्पन्न होता है। [२] “वैश्वानरो यतते सूर्येण” वैश्वानर सूर्य से मिलता है। (३) “अथ यानि एतानि औत्तमिकानि०-०तेषु वैश्वानरीयाः प्रवादा अभविष्यन्” और जो ये उत्तम लोक के देवता भग आदि हैं, उनके सूक्तों में “वैश्वानर” शब्द विशेषण आता, किन्तु आया नहीं। (४) “आदित्य कर्मणा च०” और आदित्य के कर्म [उदय आदि] से इस “वैश्वानर” की स्तुति करता, किन्तु नहीं की है। [५] “आग्नयेष्वेवहि सूक्तेषु” अग्नि के ही सूक्तों में “वैश्वानर” विशेषण आता है।