भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 890, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 890

हिन्दी निरुक्त (१२२) ७ अ० ७ पा० ६ खं० (६) “अग्निकर्मणा च” और अग्नि के दाह आदि कर्म से इस “वैश्वानर” को स्तुति करता है। कोई निरुक्तकारों के मतका खण्डन । कोई निरुक्तकार “वैश्वानर” को “प्रनूमहित्वं०” ऋचा में उसकी वर्षकर्म से स्तुति देख कर मध्यम समझते हैं, किन्तु उनका यह मत ठीक नहीं है। क्योंकि— (१) “अस्मिन्नपि एतदुपपद्यते” इस पार्थिव अग्नि में भी यह वर्षकर्म उपपन्न होता है। जैसे कि- “समानमे तत्० [ऋ०सं० २,३,२६,१] यह ऋचा कहती है। (२) “कृष्णं नियानम्” [ऋ० सं० २,३,२३,१] इस मन्त्र में मन्त्र के स्वरूप से आदित्य और प्रकरण से अग्नि की वर्षकर्म से स्तुति है । सर्वथा वर्षकर्म का कर्त्ता इस में मध्यम से भिन्न है। याज्ञिकों के मतका खण्डन । (१) “रोहात्प्रत्यवरोहश्चिकीर्षितः” का उत्तर “आम्नायवचनात्” (२) “वैश्वानरीयो द्वादश कपालो भवति” का उत्तर “अस्तिहि सौर्य एकक- पालः पञ्चकपालश्च” (३) “एतद् ब्राह्मणम्०” का उत्तर “बहुभक्तिवादीनि०” (४) सौर्यवैश्वानरी निविद्०” का उत्तर “अस्यैव सा भवति” (५) “छान्दोमिकं सूक्तम्०” का उत्तर “अस्यैव तद्०”

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