भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 891

हिन्दी निरुक्त ( १२३ ) ७ अ० ७ पा० ६ खं० (६) “हविष्पान्तीयं सूक्तम्०” का उत्तर “अस्यैव तद्०” है ॥ इसके अनन्तर “अपामु॒पस्थे०” [ऋ० सं० ४, ५, १०, ४] इस ऋचा में मन्त्र के अक्षरार्थ से मध्यम ज्योति और उत्तम ज्योति से वैश्वानर का भेद दिखाया गया है । फिर इस पाद व अध्याय की समाप्ति तक हविष्पान्तीय सूक्त की ही ६ ठी १० वीं ११ वीं तथा १६ वीं ऋचाओं से अग्नि की ही महिमा दिखाई है, जिसके जानने से अग्नि के ‘वैश्वानर’ होने में सब सन्देह निवृत्त होजाते हैं । अन्तिम प्रश्न और उत्तर । प्रश्नः- “होतृजपस्त्वनग्निवैश्वानरीयो भवति”- “देव सवितरेतन्त्वा वृणतेऽग्निं होत्राय सह पित्रा वैश्वानरेण” । हे सवितृ देव ! ऋत्विज् लोग वैश्वानर पिता के सहित तुझ अग्नि का होत्र के लिये स्वीकार करते हैं । इस मन्त्र में सविता और अग्नि एक ही को कहा गया है, इससे यहां सविता नाम भी अग्नि का ही रहेगा, और “वैश्वानर” पिता तथा उसका पुत्र अग्नि है, यह भी इसी मन्त्र से उक्त होता है । इन दोनों बातो की पर्यालोचना से यह निश्चय सहज में होजाता है कि-“वैश्वानर” देवता अग्नि से पृथक् है, क्योंकि-पिता पुत्रभाव दोनों में परस्पर भेद के बिना नहीं आता । जब कि- “वैश्वानर” अग्नि