भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 897, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 897

हिन्दी निरुक्त ( १२६ ) ८ अ० १ पा० २ खं० भाष्यकार ने "द्रविणोदाः" इस मन्त्र की उक्त रीति से दो व्याख्याएं की हैं। पहिली में 'द्रविणोदाः' इस प्रथमा- न्त को द्वितीयान्त और 'द्रविणसः' यह प्रथमाबहुवचनान्त 'ग्रावहस्तासः' इसको समानाधिकरण ऋत्विजों का विशेषण किया है। पहिला पद 'ईळते' इस क्रिया पद में कर्म कारक और दूसरा कर्त्तृ कारक होता है 'ऋत्विज्' द्रविणोदा को स्तुति करते हैं । एवम् दूसरी व्याख्या में 'द्रविणोदाः' यह पहिला पद यथास्थित प्रथमान्त ही रहता है, और दूसरा 'द्रविणसः' पद पञ्चमी का एक वचन है। पहिला पद अध्या- हार की हुई 'पिवतु' क्रिया में कर्त्तृ कारक और दूसरा अपा- दान कारक होता है- "द्रविणोदाः देवता द्रविणस् सोमसे अपना अंश पीवे" ऐसा करने में भाष्यकार को ये दो बातें बाध्य करती हैं, कि मन्त्र में दो प्रथमान्त पद कर्त्ता होने के योग्य प्रतीत होते हैं- 'द्रविणोदाः' और 'ग्रावहस्तासः, । पहिला पद प्रथमा का एक वचन है, और दूसरा प्रथमा का बहुवचन है, इसी से ये आपस में विशेषण तथा विशेष्य नहीं होसकते । पहिला पद देवता का नाम है, और दूसरा ऋत्विजों का, इस कारण भी ये आपस में विशेष्य विशेषण नहीं होसकते । दूसरे मन्त्र में 'ईळते' (स्तुति करते हैं) यह एक ही क्रिया पद है, तथा बहुवचनान्त है, इसका कर्त्ता भी बहुवचन होता है, इस कारण 'द्रविणोदाः' यह एक वचन इसका कर्त्ता नहीं होसकता और देवता स्तुति किया जाता है, किन्तु करता नहीं इस लिये भी वह 'ईळते' का कर्त्ता नहीं होसकता । सुतराम् विना