भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 898, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 898

हिन्दी निरुक्त ( १३० ) ८ अ० १ पा० २ खं० किसी उपाय के 'द्रविणोदाः' यह प्रथमा का एकवचन मन्त्र में उपयुक्त नहीं हो सकता इस कारण भाष्यकार ने ये दो प्रकार की व्याख्यायें की हैं, दोनों ही प्रकार से मन्त्र का अर्थ ठीक हो जाता है, और यह देवता का नाम 'द्रविणाः' पद भी उपयुक्त हो जाता है । पहिली व्याख्या में प्रथमान्त से द्वितीयान्त का काम लेने में 'यद्' शब्द और 'तद्' शब्द का अध्याहार उपाय किया है, इस उपाय से किसी पद को किसी विभक्ति में भी लिया जा सकता है । इसे व्याख्या में 'यद्वृत्त' कहते हैं । जैसे- 'यः द्रविणोदाः तम् ईलते' अर्थात्- जो द्रविणोदस् है, उसको स्तुति करते हैं । यहां 'यद्' 'तद्' शब्दों के सहारे से प्रथमान्त पदने ही द्वितीयान्त का कार्य दे दिया । ऐसे ही प्रयोजन के अनुसार अन्यत्र भी किया जा सकता है । दूसरी व्याख्या में 'पिबतु' क्रिया के अध्याहार करने से और 'द्रविणसः' को पञ्चमी मानने से ( जैसा कि- व्याकरण में हो सकता है ) 'द्रविणोदाः' यह प्रथमान्त ही रह जाता है । क्योंकि- अब यह 'पिबतु' क्रिया का कर्त्ता हो जाता है, किन्तु 'ईलते' का कर्म नहीं । उक्त कर्त्ता में प्रथमा विभक्ति ही होती है । सो कौन द्रविणोदस् ( द्रविणोदा ) है ? कौष्टुकि आचार्य मानते हैं कि-इन्द्र है क्योंकि- वह बल और धनका अति दान करने वाला है, और सब बल का कार्य उसी इन्द्र का है, इससे इन्द्र ही 'द्रविणोदाः' है । और कहता है । “ओजसो जातमुत मन्य एनम्” अर्थात्-(अहम्)