निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १३३ ) ८ अ० १ पा० २ खं० में 'इन्द्रपान' यह पात्रकी समाख्या या नाम है, इससे जाना जाता है कि- उस से इन्द्र ही पीता है । यदि ऐसा है, तो इन्द्र द्रविणोदस् है, यह प्राप्त होता है । “अथापि०” और भी यह अन्य हेतु इन्द्र के द्रविणोदस् होने में है। क्या ? उन्हीं ऋतुयाज मन्त्रों में इसे सोमपान से ऋषि स्तुति करता है। “होत्रात् सोमं द्रविणोदः०—०पिब ऋतुभिः” [ ऋ० सं० २, ७, २६, १ ] अर्थात्- हे द्रविणोदः ! तू होत्र से ऋतुओं के साथ सोम पी । प्रयोजन यह कि- जहां जहां सोमपान की स्तुति है, वहां वहां इन्द्र देवता है, और जो हविः जिस देवता के लिये संस्कार किया जाता है, वह उसी को दिया जाता है, इस कारण सोमपान से इन्द्र के अतिरिक्त अन्य देवता की स्तुति नहीं है, सोम का संस्कार उसी के लिये किया जाता है, अतः वहां आया हुआ 'द्रविणोदस्' नाम इन्द्र देवता के लिये ही हो सकता है। “अथापि०” और भी यह अन्य हेतु इन्द्र के द्रविणोदस् होने में है। क्या ? “द्रविणोदाः पिबतु द्राविणोदसः” अर्थात्- 'द्राविणोदसः' जिस द्रविणोदस् का पुत्र अग्नि है, वह 'द्रविणोदाः' द्रविणोदस् इन्द्रदेव 'पिबतु' पीवे । “अपाद्धोत्रात्”। [ उसी अच्छावाक के प्रैष की यह याज्या है। ] [ क्रौष्टुकि आचार्य के अभिमत पूर्व पक्ष [ प्रश्न ] के