निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १४५ ) ८ अ० २ पा० १ खं० “अग्निः पृथिवीस्थानस्तं प्रथमं व्याख्यास्यामः” (अ० ७ पा० ४ खं० १) अर्थात्- अग्नि पृथिवी स्थान का देवता है, इससे हम उसकी व्याख्या पहिले करेंगे। “तासामिध्मः प्रथमागामी भवति” [अ० ८ पा०२ खं०१] अर्थात् इनमें 'इध्म' स्वभाव से पहिले आनेवाला है। “तेषामश्वःप्रथमागामी भवति” [अ०६पा०१खं०१] अर्थात् उन में 'अश्व' स्वभाव से पहिले आने वाला है। “तेषां रथः प्रथमागामी भवति” [अ० ६ पा० २ खं० १] अर्थात् उनमें 'रथ' स्वभाव से पहिले आने वाला है। इत्यादि । पृथिवी स्थान के देवता- नामों के क्रम का विशेष रूप से प्रयोजन इस प्रकार है कि- पार्थिव ज्योति = पृथिवी लोक के तेज का संबन्ध जैसा 'अग्नि' शब्द के साथ अधिक प्रसिद्ध है, वैसा 'जातवेदस्' शब्द के साथ नहीं, जैसा 'जात- वेदस्' शब्द के साथ है, वैसा 'वैश्वानर' शब्द के साथ नहीं जैसा 'वैश्वानर' शब्द के साथ है वैसा द्रविणोदस् के साथ नहीं। इस प्रकार इन सब शब्दों के क्रम का कारण गुण के न्यूनाधिक्य से या प्रसिद्धि के न्यूनाधिक्य से लेना चाहिये। यद्यपि 'अग्नि' आदि शब्दों के समान 'इध्म' आदि शब्द भी अग्नि के या पार्थिव ज्योति के नाम हैं इससे ये उन के समान पूर्व स्थान के भागी होते हैं, तथापि 'अग्नि' आ- दि शब्द प्रत्यक्ष अग्नि के नाम हैं, और इध्म = इन्धन = काष्ठ आदि अप्रत्यक्ष अग्नि के नाम हैं। क्योंकि- काष्ठ को रगड़- ने से उसमें अग्नि प्रत्यक्ष होता है, स्वतः नहीं। इससे