भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 914, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 914

हिन्दी निरुक्त ( १४६ ) ८ अ० २ पा० १ खं० अग्नि आदि नामों की अपेक्षा इन 'इध्म' आदि नामों की गौणता है । ऐसे ही 'इध्म' आदि परोक्ष अग्नि के ही नाम हैं और 'अश्व' आदि अग्नि के स्थान मात्र में रहने वाली वस्तुओं के किन्तु किसी प्रकार की अग्नि के नहीं, इससे ये 'इध्म' आदि की अपेक्षा भी गौण हैं, इस कारण उनके अनन्तर पढे जाते हैं । इसी प्रकार 'अश्व' आदि प्राणी हैं, और 'अक्ष' (पासे) आदि अप्राणी (जड) हैं, इस कारण अश्व आदि के पश्चात् 'अक्ष' आदि नामों की स्थापना ( संग्रह ) है। ऐसे ही सब स्थानों में क्रम का प्रयोजन द्रष्टव्य है । शाकपूणि आचार्य ने स्वयम् निघण्टु शास्त्र के आरम्भ से ही सब 'गौ' आदि शब्दों का प्रयोजन कहा है । जैसा कि- वार्त्तिककार ने कहा है - “क्रमप्रयोजनं नाम्नां शाकपूण्युपलक्षितम् । प्रकल्पयेदन्यदपि न प्रज्ञामवसादयेत् ॥” नामों के क्रम का प्रयोजन शाकपूणि आचार्य ने दिखाया है, उससे अन्य प्रयोजन की भी कल्पना करे किन्तु अपनी बुद्धि को खिन्न न करे [ यदि वह ध्यान में न आवे ] । प्रयोजन यह है कि-व्युत्पत्तियों की कोई सीमा नही है, जैसे २ न्यायसंगत अर्थ प्रतीत हो, वैसे २ ही व्युत्पत्ति करे, किसी व्युत्पत्ति के ठहराने के लिये ही खिन्न न होना चाहिए । ( खं० २ ) (निरु०-) "समिद्धो अद्य मनुष्यो दुरोणे देवो