निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (१४६) ८ अ० २ पा० २ खं० हैं, उनके समूह को ध्यान करके यह वचन है। यह व्यवहित अभिधान कहलाता है- साक्षात् = असली नाम न होकर परदे से नाम लिया हुआ होता है। जैसे हिन्दू स्त्रियें अपने पति का साक्षात् नाम न लेकर उस के नाम को किसी उपाय के द्वारा बताती हैं, वैसे ही ऋचाओं में कहीं २ देवताओं के लिये भी परदे से कहा जाता है। “परोक्षप्रिया इव हि देवाः” देवता परोक्षता से-परदे से कही हुई स्तुति से प्यार करने वाले होते हैं। ऐसा ही यह श्रुति भी कहती है। इसी न्याय के अनुसार यहां “समिद्धो अद्य” इस ऋचा में 'इध्म' यह आप्रीगत गुप्त नाम है। यह बात दर्श पूर्णमास के होता के कर्म में प्रसिद्ध है-“समिधो यज” 'समिधों का यजन कर' इस मन्त्र से अध्वर्यु के द्वारा प्रेषित = प्रेरित हुआ होता “ये३यजामहे समिधः समिधो अग्नआ- ज्यस्य व्यन्तु३वौ३षट्” इस मन्त्र से “वषट्” करता है, उस “वषट्”कार के साथ या अनन्तर ही अध्वर्यु आज्य का होम करता है। इस कारण यहां 'इध्म' देवता है, यह कात्थक्य आचार्य का मानना ठीक है। “अग्निः-इति शाकपूणिः” शाकपूणि आचार्य मानते हैं कि-इस मन्त्र में अग्नि देवता है ॥ व्याख्या । शाकपूणि आचार्य यहां किस युक्ति से अग्नि देवता को मानते हैं ? (क) इध्म की अपेक्षा अग्नि होम कर्म में समीप होकर