निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १५० ) ८ अ० २ पा० २ खं उपकार करता है- पहिले इन्धन रखाजाता है, फिर अग्नि जलता है, फिर उसमें होम होता है, जो देवताओं का यजन या पूजा है, उसमें अग्नि निकट और इध्म दूसरा होता है । (ख) इध्म प्रैष कर्म में मिलकर उपकार करता है किन्तु स्वतन्त्रता से नहीं पहिले होता प्रैषमन्त्र “समिधःस- मिधो०” इत्यादि पढता है, फिर अध्वर्यु आज्य का होम करता है, अतः उसका क्रिया से स्वतन्त्र सम्बन्ध नहीं होता अर्थात्- जिस देवता के यजन का प्रैष होता है उसी का फिर यजन होता है । और यहां कात्थक्य के मत में प्रैष इध्म(समि ध् ) के यजन का हुआ, और यजन या होम अग्निमें । इसी से इध्मका क्रिया से साक्षात् सम्बन्ध न होकर अग्नि के द्वारा सम्बन्ध होता है, स्वतन्त्रता से नहीं । तथा स्वतन्त्रता के बिना उसकी ज्ञापकता ग्राह्य नहीं । अतः इध्म नाम अग्नि का ही होता है । (ग) यजति या इष्टि = दर्श पूर्णमास आदि में आप्री ऋचाओं का जो आप्री रूप है-- वे ऋचाएं जिस रूप में स्थित है- अपने स्वभाव से जिस प्रकार अर्थ को प्रकाश कर रही हैं- उनपर ध्यान देनेसे जो बुद्धि पर आपसे आप ज्ञान फैलता है, वह उनका रूप बलवत् है और वह अग्नि पक्ष को ही पुष्ट करता है, उसका उल्लङ्घन करके दूसरा अर्थ किया नहीं जासकता । आप्री का क्या रूप है ! और कैसे वह अग्नि के अर्थ हो जाती है- उसका देवता इध्म न होकर अग्नि कैसे होजाता है ? सुनो--