निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 919, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १५१ ) ८ अ० २ पा० २ खं० “समिद्धो अद्य मनुषो दुरोणे देवो देवान्यजसि जातवेदः । आ च वह मित्रमहश्चिकित्वान्त्वं दूतः कविरसि प्रचेताः॥” यह आप्री का रूप है। इसमें समिद्ध प्रज्वलित होना देवताओं का यजन करना द्योतन (प्रकाश करना) जातवेदस् नाम, देवताओं का आवाहन, और दूतता, ये सब अभिधान = शब्द अग्नि पक्षमें मुख्य रहते हैं, और इध्म पक्षमें गौण होजाते हैं । जैसे- सिंह के लिये सिंह, शब्द मुख्य रहता है, और पुरुष के लिये कहा गया गौण होता है। “गौणमुख्ययोश्च मुख्ये कार्यसंप्रत्ययः” 'जहां गौण और मुख्य दोनों उपस्थित हों वहां मुख्य में कार्य होता है यह न्याय है। इससे अपने रूप में स्थित रहती हुई आप्री का यज्ञ में बहुत उपकार होता है, इससे और सब प्रयाज अग्नि देवता के ही होते हैं, इस कारण से इस आप्री ऋचा के द्वारा अग्नि का ही यजन है, यह शाकपूणि आचार्य मानते हैं ॥ 'तनूनपात्' (२) आज्य (घी) का नाम है, यह कात्थक्य (कत्थक के पुत्र) आचार्य मानते हैं । 'नपात्' यह अननन्तरा = दूसरी प्रजा = सन्तान का नाम है. पहिली सन्तान का नाम पुत्र और उसके पुत्र का नाम नपात् = नाती (पोता) है । यहां 'तनू' नाम 'गो' (गाय) का कहा जाता है । क्यों ? इसमें भोग तत = विस्तृत हैं । उस (गो) से दूध उपजता है दूधऔर घ से आज्य (घृत) होता है । इस प्रकार कात्थक्य आ-