भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 920

हिन्दी निरुक्त ( १५२ ) ८ अ० २ पा० ३खं० चार्य 'तनूनपात् नाम घृत का बताते हैं। क्योंकि वह गौ का पोता (नाती) है। 'तनूनपात्' (३) अग्नि है, यह शाकपूणि आचार्य कहते हैं। उनका अभिप्राय यह है- यहां 'तनू' जल कहे जाते हैं। क्यों कि - वे अन्तरिक्ष में तत = फैले हुए होते हैं। उनसे ओषधि, वनस्पतियां होती हैं, ओषधि वनस्पतियों से यह (अग्नि) उत्पन्न होता है। इस प्रकार शाकपूणि के मत में 'तनूनपात्' अग्नि है। क्योंकि- वह जल का पोता है। उस 'तनूनपात्' = आज्य अथवा अग्नि की यह ऋचा है ॥२(५) ॥ (खं०३) (निरु०) “तनूनपातपथ ऋतस्य यानान्मध्वासम- ञ्जन्स्वदया सुजिह्व । मन्मानिधीभिरुत यज्ञ- मृन्धन्देवत्राच कृणुह्यध्वरं नः ॥” [८, ६, ८, २]॥ तनूनपात, 'पथः ऋतस्य' यानान् यज्ञस्य यानान् मधुना समञ्जन् स्वदय कल्याणजिह्वः। मननानि च नो धीभिर्यज्ञंत्र समर्द्धय, देवान् नो यज्ञं गमय ॥ 'नराशंसः' यज्ञः' इति कात्थक्यः नराः अस्मिन् आसीनाः शंसन्ति ॥ अग्नि'-इति शाकपूणिः । नरैः प्रशस्यो भवति। तस्य एषा भवति—॥३(६)॥