भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 921, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 921

हिन्दी निरुक्त ( १५३ ) ८ अ० २ पा० ४ खं० अर्थः- “तनूनपात्पथ” हे 'तनूनपात्' आज्य (त्वम्) तू 'ऋतस्य' (यज्ञस्य) यज्ञ के 'पथः'(मार्गान्) मार्गों को और 'यानान्' (हवींषि) हविओं को 'मध्वा' (मधुना) मधुर स्वाद से 'समञ्जन्' सींचता हुआ 'स्वदय' स्वादु कर दे। और हे सुजि- ह्वः' सुन्दर जीभ वाले! [अपनी जीभ से ऐसा करता हुआ-] 'मन्मानि' (मननानि च) हमारी मानी हुई या मांगी हुई वस्तुओं को 'कृणुहि' कर । 'धीभिः' (कर्मभिः) कर्मों से 'यज्ञम्' यज्ञ को 'ऋन्धन्' (संसाधयन्) सम्पादन करता हुआ = साधता हुआ (समर्धय) बढा । 'नः' हमारे 'अध्वरम्' (यज्ञम्) यज्ञ के प्रति देवत्रा (देवान्) देवताओं को (गमय) चला या ला।(यह हम तुझ से चाहते हैं।) ॥ शाकपूणि के मत में- हे भगवन् ! अग्ने ! तनूनपात् ! जल के पोते ! तू यज्ञ के मार्गों को हवियों को पाक के किये हुए मीठे रस से संयुक्त करता हुआ स्वादु बना । हे सुजिह्व ! अच्छी ज्वालाओं वाले ! ऐसा करता हुआ हमारी वाञ्छित वस्तुओं को सिद्ध करता हुआ यज्ञ को बढा और हमारे यज्ञ के प्रति देवताओं को ला ॥ 'नराशंस' (४) यज्ञ है, यह कात्थक्य मानते हैं। क्योंकि- इस में नर (मनुष्य) आसीन (बैठे हुए) शंसन करते हैं- देवताओं की स्तुति करते हैं । अग्नि 'नराशंस' है,-यह शाकपूणि आचार्य मानते हैं। क्योंकि-नरों से (मनुष्यों से) प्रशंसो किया जाता है । “तस्य०” उस 'नराशंस' की यह ऋचा है ॥३(६)॥ (खं० ४) (निरु०) “नराशंसस्य महिमानमेषामुपस्तोषाम

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