निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १४४ ) = अ० २ पा० ४ खं० यजतस्य यज्ञैः । ये सुक्रतवः शुचयोधियंधाः स्वदन्ति देवा उभयानि हव्या ॥” [ऋ०सं० ५,२, १, २] ॥ नराशंसस्य महिमानम्-एषाम् उपस्तुमः, यज्जि- षस्य यज्ञै ये सुकर्माणः शुचयोधियंधारयितारः स्वदयन्तु देवाः-उभयानि हवींषि सोमं च इतरा- णि च इतिवा । तान्त्राणि च आवापिकानि च इति वा ॥ ‘ईलः’ ईट्टेः स्तुतिकर्मणः । इन्धतेर्वा ॥ तस्य एषा भवति–॥४(७)॥ ‘एषाम्’ इन मनुष्यों के ‘नराशंसस्य’ वाञ्छित फल के देने वाले यज्ञ की ‘महिमानम्’ महिमा को ‘उपस्तुमः’ स्तुति करते हैं । ‘यजतस्य’ (यज्जिषस्य) यज्ञ करने वाले के ‘यज्ञैः’ (कर्मभिः) कर्मों से ‘ये’ जो ‘सुक्रतवः’ (सुकर्माणः) सुन्दर कर्म वाले ‘शुचयः’ बिलकुल पाप रहित ‘धियंधाः’ (धियंधार- यितारः) बुद्धि के धारण करने वाले ‘देवाः’ देवता हैं, वे ‘उभयानि’ दोनों प्रकार के ‘हव्या’ (हवींषि) हविष्यों को ‘स्वदन्ति’ (स्वदयन्तु) चाखें । दोनों प्रकार के हवि-सौमिक पशु में-एक सोम और दूसरे पशु पुरोडाश धाना आदि हैं । और सोम से अन्यत्र तान्त्र (प्रयाज आज्यभाग स्विष्टकृत् आदि) और आवापिक (प्रधान हविष् ) ये दो प्रकार के हवि हैं । शाकपूणि के मत में-हम नरों के इच्छित उपकारों के