निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १५८ ) ८ अ० २ पा० ६ खं० देवताओं के लिये तथा 'अदितये' पृथिवी के लिये सुखरूप होता है । 'वितर' क्या ? विशीर्णतर = बहुत काट डाला हुआ । अथवा विस्तीर्णतर = बहुत फैलाया हुआ या बिछाया हुआ । 'वरीयः' क्या ? वरतर = बहुत श्रेष्ठ । अथवा उरुतर = बहुत घना । 'स्योन' यह सुख का नाम है । कैसे ? स्यतेः । 'अव' (उप०) और 'सो' (दि०प०, धातु से है । क्योंकि- 'एतद् अवस्यन्ति' सब प्राणी इसी पर निर्भर करते हैं—इसी को निश्चय करते हैं—कैसे मिले ? कैसे हो ? अथवा सेवन करने योग्य होता है इससे यह 'स्योन' है । व्याख्या । “प्राचीनं बर्हिः” मन्त्र में कुशा या डाभ के सम्बन्ध में बहुतसी विधियों का अक्षरार्थ से स्पष्टीकरण होता है । यज्ञ में इसका बहुत उपयोग होता है। कर्मकेआरम्भ से पहिलेइसे वन में से काट कर लाना पड़ता है अतः उसके काटने या बिछाने का समय “अग्रेअन्हाम्” यह वाक्य पूर्वाह्न (दिनका पहि ला प्रहर) बताता है, और वहां कैसे काटे इसके लिये प्राचीनं बर्हिः वृज्यते” वाक्य बताता है कि- पूर्व की ओर मुख करके काटने वालो उसे पूर्व की ओर ही ऐसे २ काटता हुआ बढे जैसे २ वह पूर्वाग्र कट २ कर गिरै या उसे काट २ कर वैसे ही डाले जैसे पूर्वाग्र गिरे । जहां तक संभव हो उस कर्म में सब प्रकारपूर्व दिशाको उपयोग करें । इसका दूसरा मूल “प्रागुदग्ग्रा बर्हि च्छिनात्ति”