निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीनिरुक्त । ६३ ( ३ यः खण्डः ) १ सर्वनाम-अन्य अर्थमे | १ ऋचांस्त्वः पोषमास्ते प्रथमा एक.व० | पुपुष्वान् गायत्रन्त्वो गा- . | र्यात शक्करीषु । ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां यज्ञस्य मात्रां विमिमीत उत्वः ॥ [ऋ०स० ८,५,२-२४] * त्व-सर्वनाम २ अङ्गनाम-द्वितीया- ⎧ २ उत त्व सख्ये स्थिरपीत- अनुदात्त एक वच० ⎨ माहु' इति ⎩ [ऋ०सं० ८,२-२३-४] ३ अन्यार्थ-चतुर्थी- । ३ उतौ त्वस्मै तन्वं विसस्रे एक व० । [ऋ० स० ८-२ २३-५] ( चतुर्थ खण्डः ) ४अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः । ४ ,, प्रथमा बहु च० आदघ्नास उपकक्षास उ त्वे हृदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे ॥ [ ऋ० स० ८-२-३४-२ ] अच्छे प्रकाशवाली अपनी किरणोंको सर्व ओर फैलाया था, इस कर्मके उपलक्षणसे प्राची (पूर्व) दिशा अपना प्राचीत्त्व रखती है। उसी मेधावी आदित्यने सब दिशा- ओंको फैलाया या प्रकट किया है, जो दिशायें बुध नाम अन्तरिक्षकी अवयवभूत और सब जगत्को उपनिर्माण करनेवाली हैं अर्थात् इनमे ही सब जगत् प्रतिष्ठित होता है। तथा इन्हींमें सब जगत् भिन्न भिन्न होकर स्थित होता है, भाव यह है, कि—ऐसे गुणोंवाली दिशायें सूर्यके उदयसे ही प्रकट होती हैं। एवम् उसी आदित्य ब्रह्मने स्थूल सूक्ष्म जगत्के कारणको प्रकट किया है ॥ *- त्व शब्दकी कई आचार्योंने निपातोंमें गणना की है, किन्तु भाष्यकारके मतमें लौकिक वैदिक उदाहरणादि उपपत्तियोसे सर्वनामसंज्ञक नाम ही है सन्दिग्ध होनेसे ही निपातोंमे इसका अवतरण हुआ है। १—अत्र प्रथमादिपादेषु होतुद्गात्रुब्रह्माख्येषु प्रत्येक कर्मण ऋगध्ययन सामगानमितरैश्च