निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ अ० १ पा० ३ ख० २।
धन मत दे, अर्थात् पहिले हमें दे, और फिर औरोंको । और हमको धन मिल. जिससे कि हम् यज्ञमे या घरमें बडी बडी बाते कहे कि—“दो—खावे”। इसके अतिरिक्त हम वीरोंवाले होवे, अर्थात यदि अपुत्रवाले होवे, तो पुत्रवान् बने , और पुत्र- वान् होवे, तो कल्याण वीर पुत्रवाले हो । ४—ग्टत्सम-कूर्म्म या ग्टत्समदका पुत्र कूर्म ऋषि । त्रिष्टुप् छन्द सूर्य्य देवता। इस ऋचामि सूर्य्य की वरुण नामसे स्तुति की गई है । “प्रसीमादित्यो असृजद् विधर्त्ता ॠतं सिन्धवो वरुणस्य यन्ति । न श्राम्यन्ति न विमुञ्चन्त्येते वयो न पप्तू रघूया परिज्मन्” ॥ [ऋ० सं० २, ७, ६, ४] ‘सीम्’ निपात जब पदपूरण रहता है, तब इसका कुछ अर्थ नही लिया जाता। “आदित्य प्र असृजत” आदित्यने अपनी किरणोंको फैला दिया । [इस पक्षमे कहासे फैलाया ? या कहा फैलाया ? यह प्रश्न नही उठाया जाता] जब उक्त निपात परि- ग्रह अर्थमें होता है, [तो] “आदित्य सीम ( सर्वत ) प्र असृजत” आदित्य (सूर्य) ने सब जगहसे किरणोंको फैलाया’ [ऐसा अर्थ हो जाता है।] जो [सूर्य] ‘विधर्त्ता’ नाम रसोका या रश्मियोंका धारण करनेवाला है, अथवा अपनी रश्मियोंके जालके अन्तर्गत सब जगत्को धारण करनेवाला है। सूर्यके रश्मि वर्षाकालमे सरल या पूर्व दिशासे आभिमुख्यसे झरने लगते है, एव वैसेही सूर्यनारायणसे प्रेरित होकर सर्वलोकके जलको लेकर वरुण नाम सूर्यके मण्डलको चले जाते हैं इस प्रकार गति-दिवस- जलका लेना और छोडना इस अपने कर्मको करते हुए नहीं थकते हैं, तथा थक कर भी वैराग्यसे भी उस कर्मको नहीं छोडते। पक्षियोंके समान शीघ्र गतिसे सम्पूर्ण जगत्मे गमन करते हुए भी ये रश्मि न थकते ही है और न अपने कर्मको छोडते ही हैं। थकनेके भयसे इन्हे अपनी गति कभी धीमी नहीं करनी पडती । ऐसे गुणवाले रश्मियोका भी फैलाने या समेटनेमें सूर्य ही प्रभु है, इस लिये उस सूर्यकी ही स्तुति है । ५—वामदेवके पुत्र नकुल ऋषिने इस त्रिष्टुप् छन्दसे आदित्य देवताकी स्तुति की है। प्रवर्ग्य मे तथा अग्निचयनमें सुवर्णके धारणम विनियोग ह । 'ब्रह्म जज्ञानं प्रथम पुरस्ताद् विसीमतः सुरुचो वेन आवः । सबुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च विवः ॥ [य० सं० १३, ३] आदित्याख्य ब्रह्मने जब जगत्में अन्य पदार्थ उत्पन्न नहीं हुये थे, पहिले पूर्व दिशामे का