भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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हिन्दी निरुक्त ( १६६ ) ८ अ० २ पा० ११ खं० कुश पर ‘स्योनम्’ ( सुखम् ) सुखपूर्वक ‘आ-सदन्तु’ ( आसी- दन्तु) बैठें ॥ ‘त्वष्टा’ (११) क्यों ? वह तूर्ण ( शीघ्र ) अश्नुते (व्यापन) करता है- ऐसा निरुक्त के आचार्य मानते हैं। अथवा दीप्ति अर्थ में ‘त्विष्’ [भ्वा०प०] धातु से है। अथवा ‘करोति’ के अर्थ में ‘त्वक्ष’ [ भ्वा०प० ] धातु से है । “तस्य०” उसकी यह ऋचा है-॥१०[१३]॥ [ खं० ११ ] निरु०-] “य इमे द्यावापृथिवी जनित्री रूपै- रपिंशद्भुवनानि विश्वा। तमद्य होतरिषितो यजी- यान्दे॒वं त्वष्टारमिह यक्षि विद्वान् ॥” ( ऋ० सं० ८, ६, ९, ४ ) यः इमे द्यावापृथिव्यौ जनयित्र्यौ रूपैः अकरोत् भूतानि च सर्वाणि तम् अद्य होतः ! इषितः य- जीयान् देवं त्वष्टारम् इह यज विद्वान् । माध्यमिकः त्वष्टा-इत्याहुः । मध्यमे च स्थाने समाम्नातः । ‘अग्निः’—इति शाकपूणिः । तस्य एषा अपरा भवति ॥११[१४]॥ अर्थः- यः (त्वष्टा) जिस त्वष्टा देवने ‘इमे’ इन ‘जनित्री’ (जनयित्र्यौ) सब जगत् को जनने वालीं ‘द्यावापृथिवी’ (द्यावा- पृथिव्यौ) द्युलोक पृथिवी लोकों को ‘रूपैः’ नाना प्रकारों से