भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 932

(खं १०) (निरु०-) “आनो यज्ञं भारती तूयमेत्विला मनुष्वदिह चेतयन्ती । तिस्रो देवीर्बर्हिरेदं स्योनं सरस्वती स्वपसः सदन्तु ॥” (ऋ०सं०८,६९,३) ऐतु नो यज्ञं भारती क्षिप्रम् । 'भरतः' आदित्यः तस्य भा । इला च मनुष्यवत् इह चेतयमाना। तिस्रोदेव्यः बर्हिरिदं सुखं सरस्वती च सुकर्माणः आसीदन्तु। 'त्वष्टा' तूर्णम्-अश्नुते इति नैरुक्ताः । त्विषेर्वा स्यात् दीप्तिकर्मणः । त्वक्षतेर्वा स्यात् करोति- कर्मणः ॥ तस्य-एषा भवति—॥१०(१३)॥ अर्थ:-“आनो यज्ञं०” 'भारती' (भरतः आदित्यः तस्य भा) भरत नाम जो सूर्य उसकी 'भा' दीप्ति (द्युलोक की देवी) 'नः' हमारे 'यज्ञम्' यज्ञ को 'तूयम्' ( क्षिप्रम् ) शीघ्र 'आ-एतु' (ऐतु) आवे । 'इला' (च) और इला (पृथिवी लोक की देवी) 'मनुष्वत्' (मनुष्यवत्) मनुष्य के समान 'चेतयन्ती' चेतती हुई [जैसे मनुष्य न्योता हुआ भोजन करने को शीघ्र आता है] 'इह' हमारे इस यज्ञ में आवे । 'सर- स्वती' (च) और सरस्वती (मध्यम लोक की देवी) आवे । (ताः एताः) वे ये स्वपसः' (सुकर्माणः) उत्तम कर्म वाली 'तिस्रोदेवीः' (तिस्रो देव्यः) तीनों देवियां 'इदम्' इस 'बर्हिः'