निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 931, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १६४ ) ८ अ० २ पा० ६ खं० —————— दैव्यौ होतारौ प्रथमौ सुवाचौ निर्मिमानौ यज्ञं मनुष्यस्य मनुष्यस्य यजनाय प्रचोदयमानौ यज्ञेषु कर्त्तारौ पूर्वस्यां दिशि यष्टव्यम्-इति प्रदिशन्तौ ॥ 'तिस्रो देवी:' तिस्रो देव्यः । तासाम्-एषा भवति—॥९(१२)॥ अर्थः- 'दैव्या होतारा' ( दैव्यौ होतारौ ) देवसाक्षीं में होने वाले होता-देवतारूप होता वायु और अग्नि 'प्रथमा' ( प्रथमौ ) मनुष्य होता की अपेक्षा प्रथम हैं- पहिले हैं । 'सुवाचा' ( सुवाचौ ) सुन्दर वाणी वाले हैं । 'यज्ञम्' यज्ञ को 'मिमाना' ( निर्मिमानौ ) निर्माण करने वाले 'मनुष्य.' ( मनुष्यस्य मनुष्यस्य ) जने जने को 'यजध्यै' ( यजनाय ) यज्ञ के लिये 'प्रचोदयन्ता' ( प्रचोदयमानौ ) प्रेरणा करने वाले हैं । 'विदथेषु' ( यज्ञेषु ) यज्ञों में 'कारू' ( कर्त्तारौ ) करने वाले हैं । 'प्राचीनं ( पूर्वस्यां दिशि ) ज्योतिः' पूर्व दिशा में होने वाले आहवनीय अग्नि को 'प्रदिशा दिशन्ता' ( यष्ट- व्यम्-इति प्रदिशन्तौ ) मन्त्र से या विधिवाक्य के अनुसार यजन करना चाहिए-ऐसे आज्ञा करने वाले हैं । [ जो ये दोनों अग्नि और वायु देवता इस प्रकार नित्य ही यज्ञ के उपकार में रहते हैं, वे मेरे लिये भी ऐसा ही बर्ताव करें । ] 'तिस्रोदेवी:' (१०) क्या ? ( तिस्रो देव्यः ) तीन देवियें । "तासाम्०" उनकी यह ऋचा है ॥६(१२)॥