भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 930, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 930

हिन्दी निरुक्त ( १६३ ) ८ अ० ५ पा० ६ खं० हुईं, अथवा जनों को सुलाती हुईं, 'यजते' ( यजिष्ये ) यज्ञ कराने वालीं, 'उपाके' ( उपक्रान्ते ) आपस में मिलकर प्रशंसा करने योग्य, या एक पर एक चढ़ी हुईं 'दिव्ये' द्युलोक में उपजी हुईं, या चमकने वालीं, 'योषयो' स्त्री रूपिणी या आपस में मिली हुईं, 'बृहती' ( बृहत्यौ ) ( महत्यौ ) बड़ीं, 'सुरुक्ये' ( सुरूचने ) सुन्दर रूचने वालीं 'शुक्रपेशसम्' शुक्ल कान्ति ( गौरवर्णा ) 'श्रियम्' श्री ( शोभा ) को 'अधि-दधाने' अपने ऊपर धारण करती हुईं, 'योनौ' यज्ञ के स्थान में 'नि-आसदतां' ( सीदताम् इति वा न्यासीदताम् इति वा ) बैठें । 'शुक्र' ज्वलन अर्थ में 'शुच्' ( भ्वा०प० ) धातु से है । 'पेश' यह रूप का नाम है । कैसे ? 'पिश्' ( भ्वा०प० ) धातु से है । क्योंकि-वह विपिशित होता है- जिस द्रव्य में वह रहता है, उसे व्याप्त कर भासता है । कोई कहते हैं, वह पराश्रित होने से दूसरे में रखा हुआ जैसा होता है । 'दैव्या होतारा' (६) ( दैव्यौ होतारौ ) देवताओं के होता हैं । कौन ? यह पृथिवी का अग्नि और वोह मध्यम लोक का अग्नि ( विद्युत् ) । “तयोः०” उनकी यह ऋचा है—॥८(११)॥ ( खं० ६ ) [निरु०-] ‘दैव्या होतारा प्रथमा सुवाचा मि- माना यज्ञं मनुषो यजध्यै । प्रचोदयन्ता विद- थेषु कारू प्राचीनं ज्योतिः प्रदिशा दिशन्ता ॥” [ ऋ०सं० ८,६,९,२ ] ॥

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