निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १६८ ) ८ अ० २ पा० ११ खं० रखने वाले त्वष्टा का यजन कर । यहां मनुष्य होता जिस दिव्य होता से त्वष्टा के यजन की प्रार्थना करता है, उसमें मनुष्य होता से पृथक् देव होता और उनसे पृथक् त्वष्टा यज- नीय देव सिद्ध होता है। प्रयोजन यह कि देव होता पार्थिव अग्नि ही है, और उसका यजनीय उससे भिन्न त्वष्टा देवता मध्यम लोक का ज्योति ही होसकता है। ३- ऐतिहासिकों का मत - वे कहते हैं कि-त्वष्टा- सब शिल्पिओं का आचार्य देववर्धकि = देवताओं का खाती (बढई) दाक्षायणी का पुत्र, बारह (१२) आदित्यों में से एक आदित्य है। शाकपूर्णि आचार्य कहते हैं कि यही पार्थिव अग्नि त्वष्टा है। वे इन बातों का उत्तर इस प्रकार देते हैं- १- मध्यम स्थान में त्वष्टा का नाम है, यह उसके मध्यम होने में हेतु नहीं होसकता, क्योंकि अग्नि का भी नाम मध्यम लोक के देवताओं में [अ०५ खं०४प०२३] है। २- मन्त्र का अर्थ भी हेतु नहीं। क्योंकि- दूसरा मन्त्र "त्वष्टा दधदिन्द्राय शुष्मम्" 'इन्द्र के लिये शुष्म को धारण करता हुआ त्वष्टा' यहां इन्द्र (मध्यम लोक के देव) से पृथक् त्वष्टा कहागया है। इसके अतिरिक्त एक ही देवता में अनेक देवता के कार्य भी मन्त्रों में देखे जाते हैं जैसे कि- "अग्नि मग्न आवह" 'हे अग्ने ! तू अग्नि को ला' यहां वही बुलाने वाला औरउसी के द्वारा वह बुलाया जाने वाला भी है। क्यों कि- पार्थिव अग्नि से अन्य अग्नि कोई सूक्त का भजन करने वाला या हविः का भजन करने वाला नहीं