निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १६६ ) ८अ० २पा० १२ खं० है, जिससे वह बुलाया जाता तथा यजन किया जाता। और स्विष्टकृत मन्त्र में "स्वं महिमानमावह > 'तू अपनी महि- मा को धारण कर' यहां स्पष्ट प्रतीत होता है, वह विधि के अधीन आह्वान से अपने आत्मा को सस्कार करके दो, तीन या अनेक होजाता है, उसी प्रकार यहाँ भी अग्नि होता ही अपने दूसरे रूप से त्वष्टा कहा गया है। ३ ऐतिहासिकों के मतका समाधान भी यही है कि- अग्नि के ही वैसे गुण वर्णन करने के अर्थ उसे ऐसा कहागया है। ये शाकपूणि के मत के साधन और समाधान हैं यही सिद्धान्त भी है, इसी से आगे ऋचा भी देते हैं, जिस में त्वष्टा के अग्नि होने का विस्पष्ट लिङ्ग है [जो दूसरे में नहीं घटताहै]। ॥ ११ (१४) ॥ (खं० १२) निरु०-) “आविष्ट्यो वर्धते चारुरासु जिह्माना मूर्ध्वः स्वयशा उपस्थे । उभ त्वष्टुर्बिभ्यतुर्जाय- मानात्प्रतीची सिंहं प्रति जोषयेते ॥” (ऋ०सं० १,७,१,५) ॥ 'आविः' आवेदनात् । तत्यः(आविष्ट्यः) वर्द्धते चारुः आसु । 'चारु' चरतेः । 'जिह्मं' जिहीतेः । 'ऊर्ध्वः' उच्छ्रितो भवति ।