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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( १६६ ) ८अ० २पा० १२ खं० है, जिससे वह बुलाया जाता तथा यजन किया जाता। और स्विष्टकृत मन्त्र में "स्वं महिमानमावह > 'तू अपनी महि- मा को धारण कर' यहां स्पष्ट प्रतीत होता है, वह विधि के अधीन आह्वान से अपने आत्मा को सस्कार करके दो, तीन या अनेक होजाता है, उसी प्रकार यहाँ भी अग्नि होता ही अपने दूसरे रूप से त्वष्टा कहा गया है। ३ ऐतिहासिकों के मतका समाधान भी यही है कि- अग्नि के ही वैसे गुण वर्णन करने के अर्थ उसे ऐसा कहागया है। ये शाकपूणि के मत के साधन और समाधान हैं यही सिद्धान्त भी है, इसी से आगे ऋचा भी देते हैं, जिस में त्वष्टा के अग्नि होने का विस्पष्ट लिङ्ग है [जो दूसरे में नहीं घटताहै]। ॥ ११ (१४) ॥ (खं० १२) निरु०-) “आविष्ट्यो वर्धते चारुरासु जिह्माना मूर्ध्वः स्वयशा उपस्थे । उभ त्वष्टुर्बिभ्यतुर्जाय- मानात्प्रतीची सिंहं प्रति जोषयेते ॥” (ऋ०सं० १,७,१,५) ॥ 'आविः' आवेदनात् । तत्यः(आविष्ट्यः) वर्द्धते चारुः आसु । 'चारु' चरतेः । 'जिह्मं' जिहीतेः । 'ऊर्ध्वः' उच्छ्रितो भवति ।

हिन्दी निरुक्त ( १७० ) ८ अ० २ पा० १२ खं० 'स्वयशाः' आत्मयशाः । 'उपस्थे' उपस्थाने । “उभे त्वष्टुर्बिभ्यतुर्जायमानात्प्रतीची सिंहं प्रति जोषयेते” द्यावापृथिव्यौ- इति वा । अहोरात्रे इति वा । अरणी इति वा । प्रत्यक्ते 'सिंहं' सहनं प्रत्यासेवे- ते ॥१२(१५) ॥ इति अष्टमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥८,२ ॥ अर्थ:- “आविष्ट्यो०” 'आविष्ट्यः प्रकाश का विस्तार करने वाला 'चारुः' चलने वाला [ कभी स्थिर नहीं होता ] 'जिह्मानाम्' टेढे काष्ठों या मनुष्योंके लिये भी 'ऊर्ध्वः' सदा ऊपर की ओर जलने बाला 'उपस्थे' ( उपस्थाने ) उपस्थान में = स्तुति में 'स्वयशाः' ( आत्मयशाः ) अपने यश को धा- रण करने वाला किन्तु दूसरे में आश्रित होकर यश वाला नहीं [ ऐसा त्वष्टा = अग्नि ] 'आसु' [ क्रियासु ] इन क्रिया- ओं में 'वर्द्धते' बढता है । 'उभे' दोनों ही 'जायमानात्' ( एव ) उत्पन्न होते ही हुए 'त्वष्टुः' त्वष्टा अग्नि देव से 'बिभ्यतुः' डरीं । 'प्रतीची' ( प्रत्यक्ते ) इस के प्रति अभिमुख गई हुईं 'सिंहं-प्रति' सहन के प्रति (सहने को) 'जोषयेते' (प्रत्यासेवेते ) सेवा करती हैं ॥ 'आविष्ट्यः' क्या ? 'आविः' नाम प्रकाश, क्यों ? आवे- दन ( ज्ञान देने ) से, और 'त्य' उसका फैलाने वाला [ प्र- काश का फैलाने वाला ] 'आविष्ट्य' है ।

हिन्दी निरुक्त ( १७१ ) ८ अ० ३ पा० १ खं० 'चारु' कैसे ? गति अर्थ में 'चर' ( भ्वा०प० ) धातु से । क्योंकि- वह चलता ही रहता है, कभी स्थिर ( अचल ) नहीं होता । 'जिह्म' कैसे ? गति अर्थ में 'हा' ( जु० आ० ) धातु से । क्योंकि-वह कुटिल ( टेढा ) होने से किसी से मिलता नहीं, अलग ही चला जाता है । 'उदूष्वं' क्या ? उच्छ्रित = ऊँचा होता है । 'स्वयशाः' क्या ? आत्मयशाः = अपने यश वाला । 'उपस्थ' उपस्थान होता है । 'सभे' (दो) कौन? (क) द्यावा-पृथिवी । (ख) अहोरात्र = दिन और रात्रि । (ग) अथवा अरणि । क्यों ? उक्त तीनों ही थोक उससे डरते हैं कि-यह (अग्नि) बढ़ता हुआ हमें जला देगा। इसी से ये सब यथापक्ष उसकी सेवा करते हैं ॥१२(१५)॥ इति हिन्दीनिरुक्ते अष्टमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥८,२॥ तृतीयः पादः ॥ ( ख० १ ) निरु०-'वनस्पतिः' व्याख्यातः । तस्य-एषा भवति- ॥ १ (१६) ॥ अर्थः-वनस्पति (१२) देवतानाम ( अ०८पा०१खं०१ में ) व्याख्यान किया जाचुका है । "एष हि वनानां पाता वा पालयिता वा" अर्थात्- यह वनों का पालन करने वाला है । उसकी यह ऋचा है—॥ १ (१६) ॥

हिन्दी निरुक्तं ( १७२ ) ८ सं० ३ पा० २ खंड ( सं० २ ) (निरु०-) "उपावसृजत्तम॑न्था समञ्जन्देवानां पाथ ऋतुथा हवींषि । वनस्पतिः शमिता देवो अग्निः स्वदन्तु हव्यं मधुना घृतेन ॥” (ऋ०सं०८,६,९,५) उपावसृज, आत्मना आत्मानं समञ्जन्, देवा- नामन्नम्, ऋतौ ऋतौ हवींषि काले काले । वनस्पतिः, शमिता, देवः-अग्निः- इत्येते त्रयः स्वदयन्तु हव्यं मधुना च घृतेन च । तत्र को वनस्पतिः ? यूपः-इति कात्थक्यः । अग्निः-इति शाकपूणिः । तस्य एषा अपरा भवति ॥२(१७)॥ अर्थ- "उपावसृज०" हे देव ! (त्वम्) तू (एतत्) इस 'देवानाम्' देवताओं के 'पाथः' अन्न को 'हवींषि' और घृत आदि हविओं को 'ऋतुथा' (ऋतौ-ऋतौ = काले काले) ऋतु ऋतु पर या समय समय में 'त्मन्या' (आत्मना आत्मानम्) आत्मा से आत्मा को 'समञ्जन्' संस्कार विशेष से प्रकट करता हुआ अथवा सचिक्कण = चिकना करता हुआ 'उप' (आश्लिष्य) उसके साथ लग कर 'अवसृज' रच या बना । 'वनस्पतिः' वनस्पति, 'शमिता' शमिता और अग्निः देवः' अग्नि देव (इति एते त्रयः) ये तीनों देवता 'मधुना' मधु से 'घृतेन'-(च) और घृत से 'हव्यम्' हविः को स्वदन्तु (स्वदयन्तु) स्वादु बनायें ।

हिन्दी निरुक्त ( १७३ ) ८ अ० ३ पा० ३ खं० “तत्०” सो कौन वनस्पति है ? यूप = यज्ञ का खम्भा, यह कात्यक्य कहते हैं । अग्नि है, यह शाकपूणि मानते हैं । उसकी यह दूसरी ऋचा है ॥ २ (१७) ॥ ( खं० ३ ) (निरु०-) “अञ्जन्ति त्वा मध्वरे देवयन्तो वन- स्पते मधुना दैव्येन । यद् दुर्ध्वस्तिष्ठा द्रविणेह धत्ताद्यद्वाक्षयो मातुरस्या उपस्थे ॥” [ ऋ० सं० ३, ३, १, १ ] अञ्जन्ति त्वाम् अध्वरे देवान् कामयमाना वनस्पते मधुना दैव्येन च घृतेन च । यद् ऊर्ध्वः स्थास्यसि द्रविणानि च नो दास्यसि । यद्वा ते कृतः क्षयः, मातुःअस्या उपस्थे उपस्थाने । अग्निः- इति शाकपूणिः । तस्य एषा अपरा भवति-॥३(१८) अर्थः-“अञ्जन्ति०” इसका विश्वामित्र ऋषि, त्रि- ष्टुप् छन्द और यूप देवता तथा यूप के घृत से अञ्जन या चुपड़ने में विनियोग है, यह ऋचा पुरोरुक् तथा अनुवाक्य संज्ञक है । यूप पक्ष में निगम है ॥ हे यूप ! हे ‘वनस्पते !’ ‘त्वाम्’ तुझे ‘अध्वरे’ यज्ञ में ‘देव- यन्तः ( देवान् यष्टुं कामयमानाः ) देवताओं को यजन करने की इच्छा करते हुए ऋत्विज् और यजमान ‘दैव्येन’ संस्कार

किये हुये 'मधुना' ( घृतेन ) घृत से अथवा मध से और घृत से 'अञ्जन्ति' चुपड़ते हैं। क्यों ? 'यत्' जिस से कि-'ऊर्ध्वः' ऊपर को उठा हुआ ( ऊभा ) 'तिष्ठाः' ( स्थास्यसि ) खड़ा होगा—अञ्जन ( चुपड़ने ) के पश्चात् तुझे सीधा खड़ा करेंगे। और 'यद्वा' अथवा 'अस्याः' इस 'मातुः' माता = पृथिवी के 'उपस्थे' ( उपस्थाने ) ऊपर 'ते' तेरा 'क्षयः' स्थान ( गड्डा ) ( कृतः ) किया गया है। [ इस कारण तू अवश्य ऊभो खड़ा होगा। और खड़ा होकर प्रधान कर्म के अपूर्व (अदृष्ट) के अङ्ग को साधन करके उसके द्वारा ( नः ) हमें 'इह' इस लोक में 'द्रविणा' ( द्रविणानि ) धनों को 'धत्तात्' ( दास्यसि ) देगा ] ॥ 'वनस्पति' अग्नि है, यह शाकपूणि कहते हैं। “तस्य०” उसकी यह और तीसरी ऋचा है ॥३(१८)॥ (खंड४) (निघ०-) “देवेभ्यो वनस्पते हवींषि हिरण्यपर्ण प्रदिवस्ते अर्थम्। प्रदाक्षिणिद्रशनया नियूय ऋतस्य वक्षि पथिभी रजिष्ठैः ॥” ( )॥ देवेभ्यो वनस्पतेः! हवींषि हिरण्यपर्ण ! ऋतपर्ण ! आपिवा उपमार्थे स्यात् हिरण्यवर्णपर्ण ! इति । “प्रदिवस्ते अर्थम्”पुराणः तेसः अर्थः, यं ते प्रब्रूमः। यज्ञस्य वह पथिभिः ‘रजिष्ठैः’ ऋजुतमैः, रजस्व- लतमैः, प्रपिष्टतमैः इतिवा ॥

हिन्दी निरुक्त ( १७५ ) ८ अ० ३ पा० ४ खं० तस्य एषा अपरा भवति- ॥४(१९)॥ अर्थः- "देवेभ्यो वनस्पते०" इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषि और पुरोरुक् संज्ञा है । हे 'वनस्पते!' अग्नि देव ! 'हिरण्यपर्णा' (ऋतपर्णा) यज्ञरूप वृक्ष के पत्र (पान) रूप ! [ अपिवा उपमार्थेस्यात् ] अथवा उपमा अर्थ में होसकता है- (हिरण्यवर्णपर्णा इति) हिरण्य = सुवर्ण रंग के पत्ते वाले! जलते हुए! देव! 'देवेभ्यः' देवताओं के लिये 'हवींषि' हविओं को 'वक्षि' (वह) लेजा । कैसे? 'प्रदक्षिणिद्' प्रदक्षिण मार्ग से- देवताओं के हविः ले- जाने के पथ से- पितरों के मार्ग से भिन्न मार्ग के द्वारा । कैसे लेजाना? 'रशनया' रस्सी से 'नियूय' भले प्रकार बांधकर जिस प्रकार कि- धूम धुंवांसे में न सम्हाला गया हविः कुछ भी नगिरे कैसे मार्गों से! 'ऋतस्य (यज्ञस्य) यज्ञ के 'रजिष्ठैः' (ऋजुतमैः) बहुत सीधे 'पथिभिः' मार्गों से-यज्ञ के उनमार्गों से जो देवताओं के प्रति सीधे से भी सीधे मार्ग हैं, जिन के द्वारा कोल बहुत न लगे उन मार्गों से, अथवा (रजस्वलतमैः) जल युक्त मार्गों से [क्यों कि- वे पथिकों के लिये सुखकारी होते हैं] अथवा (प्रपिष्टतमैः) बड़े सुरूप अन्धकार से रहित = जिनमें किसी प्रकार का मोह नहो, ऐसेमार्गों से । "प्रदिवःते- अर्थम्" (पुराणः ते सः अर्थः) वह पुराना तुम्हारा अर्थ है, (यं ते प्रब्रूमः) जिसको तुम्हारे लिये हम कहरहे हैं (किन्तु तुम्हारे अदिदित कर्म में तुम्हें नहीं लगाते हैं] ॥ इस प्रकार यहां हविर्वहन = हविके लेजाने के संयोग से 'वनस्पति' शब्द का अग्नि अभिधेय = अर्थ है ।

हिन्दी निरुक्त ( १७६ ) ८ अ० ३ पा० ५ खं० इस वनस्पति = अग्नि की यह और चौथी ऋचा है- ॥ ४ (१६) ॥ ( खं० ५ ) (निघ०) "वनस्पते रशनया नियूय पिष्टतमया वयुनानि विद्वान् । वहा देवत्रा दिधिषो हवींषि प्र च दातारममृतेषु वोचः ॥" ( )॥ "वनस्पते रशनया नियूय" सुरूपतमया, "वयु- नानि विद्वान्" प्रज्ञानानि प्रजानन्, वह देवान् यज्ञे धातुः हवींषि, प्रब्रूहि च दातारम् 'अमृते- षु' देवेषु ॥ 'स्वाहाकृतयः' 'स्वाहा'-इत्येतत् 'सु' 'आह'-इति वा । 'स्वा' वाग्- 'आह'- इतिवा । 'स्वंप्राह'- इति वा । 'स्वाहुतं हविर्जुहोति- इतिवा । तासाम् एषा भवति—॥ ५[२०]॥ अर्थः- "वनस्पतेः" यह ऋचा वनस्पति देवता की ही याज्या है । हे 'वनस्पते'! 'पिष्टतमया' (सुरूपतमया) बहुत सुरूप 'रशनया' रस्सी से 'हवींषि' हविओं को 'नियूय' बांधकर 'वयुनानि' (प्रज्ञानानि) अपने अधिकार-युक्त प्रज्ञानों (विद्या- ओंका 'विद्वान्' (प्रजानन) जानता हुआ 'दिधिषो' (दिधिषोः = धातुः) देने वाले यजमान के (हविओं को) 'देवत्रा' (देवान्) देवताओं के प्रति 'वह' लेजा । 'दातारं च' ( यज्ञे ) और

यज्ञ में दाता को 'अमृतेषु' (देवेषु) देवताओं में 'प्रवोचः' (हवींषि प्रब्रूहि) कहो कि- उस यजमान ने ये हवि दिये हैं॥ इस प्रकार यहां अग्नि वनस्पति है। 'स्वाहाकृतयः' (१३) यह देवता पद है। इसमें 'स्वाहा' क्या है? 'स्वाहा' यह 'सु-आह' (सुन्दर कहता है) इन दो पदों के योग से है। अथवा 'स्वा वाग् आह' (अपनी वाणी कहती है) इन तीन पदों का संक्षेप है। अथवा 'स्वं प्राह' [अपने को कहता है] इन तीन पदों का संक्षेप है। अथवा 'स्वाहुतं हविर्जुहोति (सुन्दर होम करने योग्य हविः को होम करता है) इस वाक्य का संक्षेप [कम किया हुआ] शब्द है। “तासा०” उनकी यह ऋचा है-॥ ५ [२०]॥ (सं०६) (निरु०) “सद्यो जातो व्यमिमीत यज्ञमग्निर्- देवानांमभवत्पुरोगाः । अस्य होतुः प्रदिश्यृतस्य वाचि स्वाहा कृतं हविरदन्तु देवाः ॥” (ऋ०सं० ८,६,९,६) सद्यो जायमानो निरमिमीत यज्ञम्, अग्निः देवानाम् अभवत् पुरोगामी, “अस्य होतुः प्रदि- शि ऋतस्य” 'वाचि' आस्ये “स्वाहाकृतं हविः- अदन्तु देवाः ॥” इति-इमा आप्रीदेवता अनुक्रान्ताः ॥ अथ किं देवताः प्रयाजानुयाजाः ?

हिन्दी निरुक्त ( १७८ ) ८ अ० ३ पा० खं० ७ (क) आग्नेयाः-इत्येके ॥६(२१)॥ अर्थः-“सद्योजातः०” ( यः अयम् ) जो यह 'अग्निः' अग्नि 'सद्यः' तत्काल 'जातः' ( जायमानः ) उत्पन्न होता हुआ ही 'यज्ञम्' यज्ञ को 'व्यमिमीत' ( निरमिमीत ) नि- र्वर्त्तन करता है-सिद्ध करता है। और जो उत्पन्न होता ही 'देवानाम्' देवताओं का 'पुरोगाः' ( पुरोगामी ) आगे चलने वाला ( प्रधानता के कारण ) 'अभवत्' हुआ या होता है । 'अस्य' इस 'होतुः' देवताओं के बुलाने वाले 'प्रदिशि' (प्राच्यां दिशि पूर्व दिशा में (-उत्तर वेदि आदि में ) 'ऋतस्य' ( गत- स्य ) गए हुए अग्नि के 'वाचि' ( आस्ये ) मुख में 'स्वाहा- कृतम्' स्वाहाकार मन्त्र से डाले हुए 'हविः' हविः को 'देवाः' देवता 'अदन्तु' खावें ॥ “इति इमाः” ये आप्रीदेवता अनुक्रमण किये गए— 'इध्म' से आरम्भ करके 'स्वाहाकृति' तक क्रम पूर्वक आप्री देवता कहे गए ॥ “अथ किं०” अब यह विचार चलता है-कि-प्रयाज और अनुयाज होमों का कौन देवता है ? “आग्नेयाः” कोई आचार्य मानते हैं कि इनका अग्नि देवता है- ॥६(२१)॥ [ खं० ७ ] (निघ०-) “प्रयाजान्मे अनुयाजांश्च केवलानूर्ज- स्वन्तं हविषो दत्तभागम् । घृतं चापां पुरुषं चौ- षधीनामग्नेश्च दीर्घमायुरस्तु देवाः॥” (८,१,११,३)

हिन्दी निरुक्त ( १७६ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० “तव प्रयाजा अनुयाजाश्च केवल ऊर्जस्वन्तो हविषः सन्तु भागाः । तवाग्ने यज्ञोऽयमस्तु सर्व- स्तुभ्यं नमन्तां प्रदिशश्चतस्रः ॥” ( ऋ० सं० ८, १, ११, ३ ) “आग्नेया वै प्रयाजा आग्नेया अनुयाजाः” इति च ब्राह्मणम् । ( ख ) छन्दोदेवताः-इत्यपरम् । “छन्दांसि वै प्रयाजाश्छन्दांस्यनुयाजाः” इति च ब्राह्मणम् । (ग) ऋतुदेवताः- इत्यपरम्। “ऋतवो वै प्रयाजा ऋतवोऽनुयाजाः-” इति च ब्राह्मणम् ॥ (घ) पशुदेवताः-इत्यपरम् । “पशवो वै प्रयाजाः पशवोऽनुयाजाः”- इति च ब्राह्मणम् । (ङ) प्राणदेवताः-इत्यपरम् । “प्राणा वै प्रयाजाः प्राणा वा अनुयाजाः” इति च ब्राह्मणम् । (च) आत्मदेवताः- इत्यपरम् । “आत्मा वै प्रया- जाः आत्मा वा अनुयाजाः” इति च ब्राह्मणम् । आग्नेयाः- इति तु स्थितिः । भक्तिमात्रमितरत् ॥ किमर्थ पुनरिदमुच्यते ? “यस्यै देवतायै हविर्गृहीतं स्यात् तां मनसा

हिन्दी निरुक्त ( १८० ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० ध्यायेत् वषट् करिष्यन्"-इति ह विज्ञायते । इति इमानि एकादश आप्रीसूक्तानि । तेषां- वासिष्ठम्, आत्रेयं, वाध्यश्वं, गार्त्समदम्, इति नराशंसवन्ति । मैधातिथं, दैर्घतमसं, प्रैषिकम्, इति उभयवन्ति । अतोऽन्यानि तनूनपात्वन्ति तनूनपात्वन्ति ॥७(२२)॥ इति अष्टमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥८,३ अर्थः- प्रयाज और अनुयाजों के मत भेद से भिन्न ३ प्रकार के देवता हैं, उन्हीं को क्रमपूर्वक दिखाते हैं, तहां पहिले कोई आचार्यों का मत है कि-प्रयाज और अनुयाज अग्नि देव के हैं-उनका अग्नि देवता है। क्योंकि- "आग्नेया वै प्रयाजा आग्नेया अनुयाजाः" अर्थात्- प्रयाजों का अग्नि देवता अनुयाजों का अग्नि देवता है । यह ब्राह्मण प्रमाण है । इसके अतिरिक्त दो ऋचाएं और नीचे दी जाती हैं, जिनमें सौचीक अग्नि और विश्वेदेवों के संवाद से यही बात सिद्ध होती है । सौचीक अग्नि से विश्वे देवों ने कहा कि- 'आ हमारे हविः ला' उसने उनसे कहा कि-'मेरा यज्ञमें भाग हो' फिर उन्हों ने उससे कहा कि-वर मांग, इस के अनन्तर वह सौ- चीक अग्नि विश्वेदेवों से इस ऋचा से वर लेता है- "प्रयाजान्मे०" 'देवा !' हे विश्वे देवो ! 'मे' मुझे 'केवलान्' निराले (दूसरे देवता के सम्बन्ध से रहित) प्रयाज

हिन्दी निरुक्त ( १८१ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० होमों को 'दत्त' तुम दो । 'अनुयाजान्-च' और अनुयाज होमों को दो । 'ऊर्जस्वन्तम्' सारभूत 'हविषः' हवि के 'भागम्' भाग को दो । 'अपां ( सारं ) घृतं च' और जलों के सारभूत घृत को दो । 'ओषधीनां पुरुषं-च' और ओषधियों के सार पुरोडाश को दो । 'अग्नेः-च' ( मम ) और मुझ अग्नि का 'दीर्घम्' बड़ा 'आयुः' आयु 'अस्तु' हो [ किन्तु जिस प्रकार मेरे पहिले भाई हविः को वहन करते हुए-देवताओं के अर्थ हविः को ढोते हुए वषट्कार मन्त्र से छिन्न होकर मर गए, वैसे मैं न मरूं ] ॥ इसके उत्तर में विश्वे देवताओं ने उसे इस दूसरी ऋचा से वर दिये हैं - “तव प्रयाजाः०” हे 'अग्ने !' अग्निदेव ! 'तव प्रया- जाः सन्तु' तेरे प्रयाज हों, 'अनुयाजाश्च केवलाः' और नि- राले अनुयाज हों, 'ऊर्जस्वन्तः हविषः भागाः सन्तु' और सारभूत हविः के भाग हों, हे अग्ने ! और क्या ? 'अयम् सर्वः यज्ञः तव अस्तु' यह सारा यज्ञ तेरा हो, 'चतस्रः प्रदिशः तुभ्यं नमन्ताम्' चारों दिशाएं तेरे लिये झुकें, [ जो कुछ तू चाहता है, सब तुझे प्राप्त हो ? इस प्रकार उपर्युक्त ब्राह्मण और ऋचाओं के अक्षरार्थ से यह स्पष्ट रूप से सिद्ध होता है कि-प्रयाज और अनुयाज अग्नि देवता के हैं ॥ (ख) छन्द देवताओं के हैं, ऐसा और मत है । क्यों कि- “छन्दांसि०” अर्थात्- छन्द प्रयाज हैं और छन्द अनुयाज हैं, यह ब्राह्मण वाक्य है । (ग) ऋतु देवताओं के हैं, यह और मत है । क्यों कि- “ऋतवो वै०” अर्थात्- ऋतु प्रयाज हैं और ऋतु अनुयाज हैं, यह ब्राह्मण वाक्य है ।

हिन्दी निरुक्त ( १८२ ) ८ अ० ३पा० ७खं (घ) पशु देवताओं के हैं, यह और मत है। क्यों कि- “पशवोवै०” अर्थात्- पशु प्रयाज हैं और पशु अनुयाज हैं, यह ब्राह्मण वाक्य है। (ङ) प्राण देवताओं के हैं, यह और मत है। क्यों कि- “प्राणावै०” अर्थात्- प्राण प्रयाज हैं और प्राण अनुयाज हैं, यह ब्राह्मण वाक्य है। (च) आत्मा देवता के हैं, यह और मत है। क्यों कि- “आत्मावै” आत्मा प्रयाज हैं और आत्मा अनुयाज हैं, यह ब्राह्मण वाक्य है। प्रयाज और अनुयाजों का अग्नि ही देवता है, यह स्थिति = सिद्धान्त है। और सब भागमात्र- अंशमात्र-गौण है। क्यों फिर यह कहाजाता है ! “यस्यै०” 'जिस देवता के अर्थ हविः ग्रहण किया हुआ हो, वषट् कार करने वाला होता ऋत्विज् उसको देवतामनसे ध्यान करे यह ब्राह्मण ग्रन्थ में जाना जाता है। ये ग्यारह आप्री सूक्त है। उन में 'वासिष्ठ = वसिष्ठ का आत्रेय = अत्रिका, वाध्र्यश्व = वध्र्यश्व का, गार्त्समद् = गृत्समद् का, ये चार सूक्त नाराशंस वाले होते हैं। मेधातिथ = मेधातिथि का दैर्घतमस = दीर्घतमा का और प्रैषिक = प्रैष ग्रन्थ का सूक्त ये तीन उभयवान् = नराशंस और तनून- पात् दोनो देवताओंवाले होते हैं। इनसे अन्य तनूनपात् देवता वाले हैं = ७(२२) ॥ इति हिन्दीनिरुक्ते अष्टमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ८,३॥

हिन्दी निरुक्त \qquad ( १८३ ) \qquad ८ अ० ३ पा० ७ खं०

व्याख्या ।

द्वितीय और तृतीयपाद ।

आप्री देवताः ।

इस अध्याय के इन अवशिष्ट दो पादों में आप्री देवता ओं की ही भाष्यकारने व्याख्या पूरी की है। इद्ध्मः (१) तनूनपात् (२) नराशंसः (४) ईलः (५) बर्हिः (६) द्वारः (७) उषासानक्ता (८) दैव्याहोतारा (६) तिस्रो देवीः (१०) त्वष्टा [११] वनस्पतिः (१२) स्वाहाकृतयः (१३) इन बारह देवताओं की आप्रीसंज्ञा है। इसके अतिरिक्त इन देवताओं की जो ऋचाएं हैं, उनको भी 'आप्री' नाम से बोधित करते हैं। जैसे कि- "आप्रीभिराप्रीणाति" (ऐ० ब्रा० अ० ६ खं०४) इस ऐतरेय श्रुति में 'आप्री' शब्द इन देवताओं की ऋचाओं के लिये ही आया है। इन आप्री देवताओं को प्रयाज देवता भी कहते हैं। क्यों कि- ये ही देवता प्रायः यज्ञों में प्रयाज होमों के देवता होते हैं। ऋ- ग्वेद की मन्त्र संहिता में जहां इनके मन्त्र आते हैं तो वे प्रायः एक साथ तथा यथोक्त क्रम से ही आते हैं। इनकी स्तुतियों के मन्त्र समूह आप्रीसूक्त कहलाते हैं तथा मन्त्र संहिता में वे दश स्थानों में आते हैं, अथवा यों समझिये कि इन देवताओं के ऋग्वेद की मन्त्र संहिता में दश (१०) सूक्त (आप्रीसूक्त) हैं, जिस क्रम से निघण्टु में इनके इध्म आदि नाम पढे हैं, उसी क्रम से इनके मन्त्र भी दशों स्थानों में आते हैं, यह नहीं कि- वे ही मन्त्र फिर २ आते हैं, बलकि— यों कहिये कि- वे सब भिन्न २ प्रकार के हैं और भिन्न २

हिन्दी निरुक्त ( १०४ ) द० अ० ३ पा० ७ खं०


ही ऋषि उनके द्रष्टा या साक्षात्कर्ता हैं। हां इन सूक्तों में तनून्पात् और नराशंस देवताओं को लेकर तीन भेद होगये है। जैसे किसी ऋषिको तनूनपात् देवता का ही मन्त्र दिखाई दिया, किन्तु नराशंस देवता का नहीं, सुतराम् उसको ग्यारह (११) ही ऋचाओं का सूक्त दिखाई दिया और वह नराशंस रहित है। एवम् किसी ऋषि को आप्री देवताओं के अन्य मन्त्रों के साथ नराशंस देवता का ही मन्त्र दृष्टिगोचर हुआ, किन्तु तनूनपात् का नहीं। वह सूक्त तनूनपात् रहित ग्यारह (११) ऋचाओं का है। और इसी प्रकार किसी ऋषि को दोनों ही तनूनपात् तथा नराशंस देवताओं के मन्त्र दिखाई दिये, अतः वह सूक्त बारह ऋचाओं का है। इस प्रकार इन सूक्तों में तीन भेद होगये। अर्थात्- (१) कोई तनूनपात् वाले हैं [२] कोई नराशंस वाले हैं और (३) कोई तनूनपात् तथा नराशंस दोनों देवताओं वाले हैं। यह पहिले कहा जाचुका है कि- ऋग्वेद मन्त्र संहिता में दश स्थानों में दश आप्रीसूक्त आये हैं, इनके अतिरिक्त इनका एक ग्यारहवां प्रैषसूक्त और है, जो उक्त मन्त्र संहिता के परिशिष्ट के प्रैषाध्याय में पठित है। यह सूक्त १३ मन्त्रों का है और वह प्रयाज प्रैष नामसे प्रसिद्ध है। इस सूक्त में १३वां मन्त्र इन्द्र देवता का है, जो आप्री देवताओं से पृथक् है। इसी प्रकार मन्त्र संहिता में भी दूसरा आप्रीसूक्त १३ ऋचा ओं का है और उसमें भी १३ वीं ऋचा इन्द्र देवता की ही है, तथा वह आप्री देवता भी नहीं है। इस रीति से सब मिला कर ग्यारह (११) आप्री सूक्त हैं। अतएव भगवान् यास्क इस पूर्वोक्त अर्थसमूह को संक्षेप से यों कहते हैं—

हिन्दी निरुक्त ( १८५ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० “इति- इमानि- एकादश- आप्रीसूक्तानि। तेषां वासिष्ठम्, आत्रेयं, वाध्यश्वं, गार्त्समदम्- इति नाराशंसवन्ति। मैधातिथं, दैर्घतमसं, प्रैषिकम्- इति- उभयवन्ति। अतोऽन्यानि तनूनपात्वन्ति तनूनपात्वन्ति”(नि०अ०८पा०३ खं०७) अर्थात्-ये ग्यारह आप्री सूक्त हैं। उन में- (१) वसिष्ठ ऋषि का सूक्त, (२) अत्रि ऋषि का सूक्त, (३) वध्यश्व ऋषि का सूक्त (४) गृत्समद् ऋषि का सूक्त,-ये चार सूक्त नाराशंस ] वाले हैं। (१) मेधातिथि का सूक्त, (२) दीर्घतमस् का सूक्त, (३) प्रैष सम्बन्धि ( परिशिष्ट वाला ) सूक्त ये तीन दोनों (तनूनपात् तथा नराशंस) देवताओं वाले हैं। [ १-४ ] इन से अन्य चार सूक्त तनूनपात् देवताओं वाले हैं। इन सब के परिज्ञान के अर्थ हम एक संक्षिप्त चित्र देते हैं, उससे पाठकों के प्रत्यक्ष में पूर्वोक्त सब अर्थ भले प्रकार से आजायगा । होतृ पठनीय १० सूक्त और उनके ऋषि आदि। (१) सुसमिद्धोन इत्यादि (१-१-२४) सूक्त १२ ऋचा- ओं का है। इसका काण्व मेधातिथि ऋषि और गायत्री छन्द है। इन सब ऋचाओं के क्रम से इध्मः, वा समिद्धोऽ- ग्निः आदि १२ देवता हैं। और पशु कर्म में कण्व गोत्रों का

हिन्दी निरुक्त ( १८६ ) ८ अ० ३पा० ७खं आप्री सूक्त है । अर्थात्-उनके पशु कर्म में प्रयाज होमो' में होता इन मन्त्रो' को याज्या करता है ( पढता है ) ॥ ( २ ) समिद्धोऽग्न इत्यादि ( २-२-१०) सूक्त १३ ऋचाओं का है । इसका औचथ्य दीर्घतमा ऋषि और अनु- ष्टुप् छन्द है। यहां प्रथम ऋचा का समिध् (१) नामक अग्नि अथवा समिद्ध अग्नि देवता है । और द्वितीयादि ऋचाओं के तनूनपात् ( २ ), नराशंसः (३), इलः (४), बर्हिः (५), देवी- द्वारः (६), उषासानक्ता (७), दैव्यौ होतारौ प्रचेतसौ (८), ति- स्रो देव्यः ( ६ )-सरस्वतीलाभारत्यः, त्वष्टा (१०) वनस्पतिः ( ११ ) स्वाहाकृतिः ( १२ ),- ये क्रम से देवता हैं । अन्तिम ( १३वीं ) ऋचा का इन्द्र देवता है । 'देवीर्द्वारः' ये बहुत देवता हैं। उषासानक्ता और दैव्यौ होतारौ प्रचेतसौ, दो देवता हैं, तथा तिस्रो देव्यः ( तीन देवियें ) इसी की व्याख्या सरस्वती, इला और भारती, यह है । यहां एक स्थान में अनेक देवता भी एक देवता के रूप में समझे जाते हैं । यहां 'इध्म' (इन्धन) और 'तनूनपात्' ( आज्य = घृत ) आदि यज्ञ के अवयव या साधनरूप वस्तुओं से यज्ञ ही उक्त होता है, इस कारण उनके मन्त्रों का यज्ञ ही देवता है,-यह कात्थक्य आचार्य्य का मत है। समिध् आदि शब्दों से अग्नि ही उक्त होता है, अतः वही देवता है,- यह शाकपूर्णि का मत है । ( सा० भा० ) पशु कर्म में अङ्गिरो गोत्रोत्पन्नों का यह आप्रीसूक्त है ॥ ( ३ ) समिद्धोऽअद्य-इत्यादि ( अ २ अ०५ व८ ) सूक्त ११ ऋचाओं का है । इसका अगस्त्य ऋषि और गायत्री छन्द है। इसकी ११ ऋचाओं के क्रम से समिद्ध अग्नि और तनू-

हिन्दी निरुक्त ( १८७ ) ८ अ० ३ पा० ७ क नपात् आदि नराशंस वर्जित ग्यारह ( ११ ) देवता हैं, पशु- कर्म में अगस्त्य के गोत्रों का एकादश प्रयाज रूप यह आप्री सूक्त है ॥ ( ४ ) समिद्धोऽग्निः-इत्यादि ( अ० २ अ० ५ व २२ ) सूक्त ११ ऋचाओं का है । इसका गृत्समद ( शौनक ) ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द है । ७वीं ऋक् जगती छन्द है । समिद्ध अग्नि और तनूनपात्-वर्जित नराशंस आदि ११ देवता हैं । पशु कर्म में शुनकों का यह आप्री सूक्त है ॥ ( ५ ) समिसमित्-इत्यादि ( अ०२अ०८व२२ ) सूक्त ११ ऋचाओं का है । इसका विश्वामित्र ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द है । इध्म आदि स्वाहाकृतिपर्यन्त नराशंसवर्जित क्रम से ११ देवता हैं । पशु कर्म में विश्वामित्र गोत्रों का यह आप्रीसूक्त है । इस सूक्त की 'तनः'-यह ऋचा दर्श पौर्ण- मास यागों में पत्नीसंयाज होमों में त्वष्टा देवता की याज्या है । तथा यही ऋचा त्वष्टा देवता के पशु में पुरोडाश की अनुवाक्या है ॥ ( ६ ) सुसमिद्धाय-इत्यादि ( अ०३अ०४व२० ) सूक्त ११ ऋचाओं का है । इसका आत्रेय वसुश्रुत ऋषि और गा- यत्री छन्द है । इध्म आदि तनूनपात्-वर्जित ११ देवता हैं । पशु में अत्रिगोत्रों का यह आप्री सूक्त है । (७) जुषस्वनः-इत्यादि ( अ०६अ०७व२४ ) सूक्त ११ ऋचाओं का है । इसका वसिष्ठ ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द है। समिद्ध आदि तनूनपात्-वर्जित क्रम से प्रत्येक ऋचाओं के ११ देवता हैं । पशु में वसिष्ठ गोत्रों का यह आप्री सूक्त है ।

हिन्दी निरुक्त ( १८८ ) ८ अ० ३ पा० ७ ख० तथा प्रथम ऋचा पत्नीसंयाज में त्वष्टा के याग की याज्या और त्वष्टा के पशु में पुरोडाश की अनुवाक्या भी है ॥ (८) समिद्ध-इत्यादि (अ० ६ अ० ७ व २४) सूक्त ११ ऋचाओं का है । इसका काश्यप असित अथवा देवल ऋषि ८वीं ६वीं १०वीं ११वीं इन चार ऋचाओं को अनुष्टुप् तथा शेष ७ ऋचाओं का गायत्री छन्द है । समिद्ध आदि नराशंस वर्जित प्रत्येक ऋचा के क्रम से ११ देवता हैं काश्यपों का पशु में यह आप्री सूक्त है ॥ (६) इमाम्-इत्यादि (अ० ८ अ० २ व २१) सूक्त ११ ऋचाओं का है । वाध्यश्व सुमित्र ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द है । समिध् आदि तनूनपात्-वर्जित क्रम से ऋचाओं के देवता हैं, वध्यश्व गोत्रों का पशु में यह आप्री सूक्त है ॥ (१०) समिद्धो अद्य मनुषो दुरोणे-इत्यादि (अ० ८ अ० ६ व ८) सूक्त ११ ऋचाओं का है । इसका भार्गव जमदग्नि अथवा उसका पुत्र राम जो परशुराम नाम से प्रसिद्ध है ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द है । समिध् आदि नराशंस वर्जित ११ देवता हैं । पशु में जामदग्न्यों का यह आप्रीसूक्त है ॥ (११) मैत्रावरुण पठनीय ११वां आप्री प्रैष सूक्त देवता मन्त्र (१) इध्मः । होतायक्षदग्नि समिधा सुसमिधा० वेत्वाज्यस्य होतर्यज ॥१॥ (२) तनूनपात् । होतायक्षत्तनूनपातमदितेर्गर्भे० वेत्वा० ॥२॥ (३) नराशंसः । होतायक्षन्नराशंसं नृशंसं नृः प्रशस्तं० वे- त्वा० ॥ ३ ॥