निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १७१ ) ८ अ० ३ पा० १ खं० 'चारु' कैसे ? गति अर्थ में 'चर' ( भ्वा०प० ) धातु से । क्योंकि- वह चलता ही रहता है, कभी स्थिर ( अचल ) नहीं होता । 'जिह्म' कैसे ? गति अर्थ में 'हा' ( जु० आ० ) धातु से । क्योंकि-वह कुटिल ( टेढा ) होने से किसी से मिलता नहीं, अलग ही चला जाता है । 'उदूष्वं' क्या ? उच्छ्रित = ऊँचा होता है । 'स्वयशाः' क्या ? आत्मयशाः = अपने यश वाला । 'उपस्थ' उपस्थान होता है । 'सभे' (दो) कौन? (क) द्यावा-पृथिवी । (ख) अहोरात्र = दिन और रात्रि । (ग) अथवा अरणि । क्यों ? उक्त तीनों ही थोक उससे डरते हैं कि-यह (अग्नि) बढ़ता हुआ हमें जला देगा। इसी से ये सब यथापक्ष उसकी सेवा करते हैं ॥१२(१५)॥ इति हिन्दीनिरुक्ते अष्टमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥८,२॥ तृतीयः पादः ॥ ( ख० १ ) निरु०-'वनस्पतिः' व्याख्यातः । तस्य-एषा भवति- ॥ १ (१६) ॥ अर्थः-वनस्पति (१२) देवतानाम ( अ०८पा०१खं०१ में ) व्याख्यान किया जाचुका है । "एष हि वनानां पाता वा पालयिता वा" अर्थात्- यह वनों का पालन करने वाला है । उसकी यह ऋचा है—॥ १ (१६) ॥