निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 937, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १७० ) ८ अ० २ पा० १२ खं० 'स्वयशाः' आत्मयशाः । 'उपस्थे' उपस्थाने । “उभे त्वष्टुर्बिभ्यतुर्जायमानात्प्रतीची सिंहं प्रति जोषयेते” द्यावापृथिव्यौ- इति वा । अहोरात्रे इति वा । अरणी इति वा । प्रत्यक्ते 'सिंहं' सहनं प्रत्यासेवे- ते ॥१२(१५) ॥ इति अष्टमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥८,२ ॥ अर्थ:- “आविष्ट्यो०” 'आविष्ट्यः प्रकाश का विस्तार करने वाला 'चारुः' चलने वाला [ कभी स्थिर नहीं होता ] 'जिह्मानाम्' टेढे काष्ठों या मनुष्योंके लिये भी 'ऊर्ध्वः' सदा ऊपर की ओर जलने बाला 'उपस्थे' ( उपस्थाने ) उपस्थान में = स्तुति में 'स्वयशाः' ( आत्मयशाः ) अपने यश को धा- रण करने वाला किन्तु दूसरे में आश्रित होकर यश वाला नहीं [ ऐसा त्वष्टा = अग्नि ] 'आसु' [ क्रियासु ] इन क्रिया- ओं में 'वर्द्धते' बढता है । 'उभे' दोनों ही 'जायमानात्' ( एव ) उत्पन्न होते ही हुए 'त्वष्टुः' त्वष्टा अग्नि देव से 'बिभ्यतुः' डरीं । 'प्रतीची' ( प्रत्यक्ते ) इस के प्रति अभिमुख गई हुईं 'सिंहं-प्रति' सहन के प्रति (सहने को) 'जोषयेते' (प्रत्यासेवेते ) सेवा करती हैं ॥ 'आविष्ट्यः' क्या ? 'आविः' नाम प्रकाश, क्यों ? आवे- दन ( ज्ञान देने ) से, और 'त्य' उसका फैलाने वाला [ प्र- काश का फैलाने वाला ] 'आविष्ट्य' है ।