भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 950

हिन्दी निरुक्त \qquad ( १८३ ) \qquad ८ अ० ३ पा० ७ खं०

व्याख्या ।

द्वितीय और तृतीयपाद ।

आप्री देवताः ।

इस अध्याय के इन अवशिष्ट दो पादों में आप्री देवता ओं की ही भाष्यकारने व्याख्या पूरी की है। इद्ध्मः (१) तनूनपात् (२) नराशंसः (४) ईलः (५) बर्हिः (६) द्वारः (७) उषासानक्ता (८) दैव्याहोतारा (६) तिस्रो देवीः (१०) त्वष्टा [११] वनस्पतिः (१२) स्वाहाकृतयः (१३) इन बारह देवताओं की आप्रीसंज्ञा है। इसके अतिरिक्त इन देवताओं की जो ऋचाएं हैं, उनको भी 'आप्री' नाम से बोधित करते हैं। जैसे कि- "आप्रीभिराप्रीणाति" (ऐ० ब्रा० अ० ६ खं०४) इस ऐतरेय श्रुति में 'आप्री' शब्द इन देवताओं की ऋचाओं के लिये ही आया है। इन आप्री देवताओं को प्रयाज देवता भी कहते हैं। क्यों कि- ये ही देवता प्रायः यज्ञों में प्रयाज होमों के देवता होते हैं। ऋ- ग्वेद की मन्त्र संहिता में जहां इनके मन्त्र आते हैं तो वे प्रायः एक साथ तथा यथोक्त क्रम से ही आते हैं। इनकी स्तुतियों के मन्त्र समूह आप्रीसूक्त कहलाते हैं तथा मन्त्र संहिता में वे दश स्थानों में आते हैं, अथवा यों समझिये कि इन देवताओं के ऋग्वेद की मन्त्र संहिता में दश (१०) सूक्त (आप्रीसूक्त) हैं, जिस क्रम से निघण्टु में इनके इध्म आदि नाम पढे हैं, उसी क्रम से इनके मन्त्र भी दशों स्थानों में आते हैं, यह नहीं कि- वे ही मन्त्र फिर २ आते हैं, बलकि— यों कहिये कि- वे सब भिन्न २ प्रकार के हैं और भिन्न २