भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 949, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 949

हिन्दी निरुक्त ( १८२ ) ८ अ० ३पा० ७खं (घ) पशु देवताओं के हैं, यह और मत है। क्यों कि- “पशवोवै०” अर्थात्- पशु प्रयाज हैं और पशु अनुयाज हैं, यह ब्राह्मण वाक्य है। (ङ) प्राण देवताओं के हैं, यह और मत है। क्यों कि- “प्राणावै०” अर्थात्- प्राण प्रयाज हैं और प्राण अनुयाज हैं, यह ब्राह्मण वाक्य है। (च) आत्मा देवता के हैं, यह और मत है। क्यों कि- “आत्मावै” आत्मा प्रयाज हैं और आत्मा अनुयाज हैं, यह ब्राह्मण वाक्य है। प्रयाज और अनुयाजों का अग्नि ही देवता है, यह स्थिति = सिद्धान्त है। और सब भागमात्र- अंशमात्र-गौण है। क्यों फिर यह कहाजाता है ! “यस्यै०” 'जिस देवता के अर्थ हविः ग्रहण किया हुआ हो, वषट् कार करने वाला होता ऋत्विज् उसको देवतामनसे ध्यान करे यह ब्राह्मण ग्रन्थ में जाना जाता है। ये ग्यारह आप्री सूक्त है। उन में 'वासिष्ठ = वसिष्ठ का आत्रेय = अत्रिका, वाध्र्यश्व = वध्र्यश्व का, गार्त्समद् = गृत्समद् का, ये चार सूक्त नाराशंस वाले होते हैं। मेधातिथ = मेधातिथि का दैर्घतमस = दीर्घतमा का और प्रैषिक = प्रैष ग्रन्थ का सूक्त ये तीन उभयवान् = नराशंस और तनून- पात् दोनो देवताओंवाले होते हैं। इनसे अन्य तनूनपात् देवता वाले हैं = ७(२२) ॥ इति हिन्दीनिरुक्ते अष्टमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ८,३॥