निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १८१ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० होमों को 'दत्त' तुम दो । 'अनुयाजान्-च' और अनुयाज होमों को दो । 'ऊर्जस्वन्तम्' सारभूत 'हविषः' हवि के 'भागम्' भाग को दो । 'अपां ( सारं ) घृतं च' और जलों के सारभूत घृत को दो । 'ओषधीनां पुरुषं-च' और ओषधियों के सार पुरोडाश को दो । 'अग्नेः-च' ( मम ) और मुझ अग्नि का 'दीर्घम्' बड़ा 'आयुः' आयु 'अस्तु' हो [ किन्तु जिस प्रकार मेरे पहिले भाई हविः को वहन करते हुए-देवताओं के अर्थ हविः को ढोते हुए वषट्कार मन्त्र से छिन्न होकर मर गए, वैसे मैं न मरूं ] ॥ इसके उत्तर में विश्वे देवताओं ने उसे इस दूसरी ऋचा से वर दिये हैं - “तव प्रयाजाः०” हे 'अग्ने !' अग्निदेव ! 'तव प्रया- जाः सन्तु' तेरे प्रयाज हों, 'अनुयाजाश्च केवलाः' और नि- राले अनुयाज हों, 'ऊर्जस्वन्तः हविषः भागाः सन्तु' और सारभूत हविः के भाग हों, हे अग्ने ! और क्या ? 'अयम् सर्वः यज्ञः तव अस्तु' यह सारा यज्ञ तेरा हो, 'चतस्रः प्रदिशः तुभ्यं नमन्ताम्' चारों दिशाएं तेरे लिये झुकें, [ जो कुछ तू चाहता है, सब तुझे प्राप्त हो ? इस प्रकार उपर्युक्त ब्राह्मण और ऋचाओं के अक्षरार्थ से यह स्पष्ट रूप से सिद्ध होता है कि-प्रयाज और अनुयाज अग्नि देवता के हैं ॥ (ख) छन्द देवताओं के हैं, ऐसा और मत है । क्यों कि- “छन्दांसि०” अर्थात्- छन्द प्रयाज हैं और छन्द अनुयाज हैं, यह ब्राह्मण वाक्य है । (ग) ऋतु देवताओं के हैं, यह और मत है । क्यों कि- “ऋतवो वै०” अर्थात्- ऋतु प्रयाज हैं और ऋतु अनुयाज हैं, यह ब्राह्मण वाक्य है ।