भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 947, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 947

हिन्दी निरुक्त ( १८० ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० ध्यायेत् वषट् करिष्यन्"-इति ह विज्ञायते । इति इमानि एकादश आप्रीसूक्तानि । तेषां- वासिष्ठम्, आत्रेयं, वाध्यश्वं, गार्त्समदम्, इति नराशंसवन्ति । मैधातिथं, दैर्घतमसं, प्रैषिकम्, इति उभयवन्ति । अतोऽन्यानि तनूनपात्वन्ति तनूनपात्वन्ति ॥७(२२)॥ इति अष्टमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥८,३ अर्थः- प्रयाज और अनुयाजों के मत भेद से भिन्न ३ प्रकार के देवता हैं, उन्हीं को क्रमपूर्वक दिखाते हैं, तहां पहिले कोई आचार्यों का मत है कि-प्रयाज और अनुयाज अग्नि देव के हैं-उनका अग्नि देवता है। क्योंकि- "आग्नेया वै प्रयाजा आग्नेया अनुयाजाः" अर्थात्- प्रयाजों का अग्नि देवता अनुयाजों का अग्नि देवता है । यह ब्राह्मण प्रमाण है । इसके अतिरिक्त दो ऋचाएं और नीचे दी जाती हैं, जिनमें सौचीक अग्नि और विश्वेदेवों के संवाद से यही बात सिद्ध होती है । सौचीक अग्नि से विश्वे देवों ने कहा कि- 'आ हमारे हविः ला' उसने उनसे कहा कि-'मेरा यज्ञमें भाग हो' फिर उन्हों ने उससे कहा कि-वर मांग, इस के अनन्तर वह सौ- चीक अग्नि विश्वेदेवों से इस ऋचा से वर लेता है- "प्रयाजान्मे०" 'देवा !' हे विश्वे देवो ! 'मे' मुझे 'केवलान्' निराले (दूसरे देवता के सम्बन्ध से रहित) प्रयाज

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