भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 951

हिन्दी निरुक्त ( १०४ ) द० अ० ३ पा० ७ खं०


ही ऋषि उनके द्रष्टा या साक्षात्कर्ता हैं। हां इन सूक्तों में तनून्पात् और नराशंस देवताओं को लेकर तीन भेद होगये है। जैसे किसी ऋषिको तनूनपात् देवता का ही मन्त्र दिखाई दिया, किन्तु नराशंस देवता का नहीं, सुतराम् उसको ग्यारह (११) ही ऋचाओं का सूक्त दिखाई दिया और वह नराशंस रहित है। एवम् किसी ऋषि को आप्री देवताओं के अन्य मन्त्रों के साथ नराशंस देवता का ही मन्त्र दृष्टिगोचर हुआ, किन्तु तनूनपात् का नहीं। वह सूक्त तनूनपात् रहित ग्यारह (११) ऋचाओं का है। और इसी प्रकार किसी ऋषि को दोनों ही तनूनपात् तथा नराशंस देवताओं के मन्त्र दिखाई दिये, अतः वह सूक्त बारह ऋचाओं का है। इस प्रकार इन सूक्तों में तीन भेद होगये। अर्थात्- (१) कोई तनूनपात् वाले हैं [२] कोई नराशंस वाले हैं और (३) कोई तनूनपात् तथा नराशंस दोनों देवताओं वाले हैं। यह पहिले कहा जाचुका है कि- ऋग्वेद मन्त्र संहिता में दश स्थानों में दश आप्रीसूक्त आये हैं, इनके अतिरिक्त इनका एक ग्यारहवां प्रैषसूक्त और है, जो उक्त मन्त्र संहिता के परिशिष्ट के प्रैषाध्याय में पठित है। यह सूक्त १३ मन्त्रों का है और वह प्रयाज प्रैष नामसे प्रसिद्ध है। इस सूक्त में १३वां मन्त्र इन्द्र देवता का है, जो आप्री देवताओं से पृथक् है। इसी प्रकार मन्त्र संहिता में भी दूसरा आप्रीसूक्त १३ ऋचा ओं का है और उसमें भी १३ वीं ऋचा इन्द्र देवता की ही है, तथा वह आप्री देवता भी नहीं है। इस रीति से सब मिला कर ग्यारह (११) आप्री सूक्त हैं। अतएव भगवान् यास्क इस पूर्वोक्त अर्थसमूह को संक्षेप से यों कहते हैं—