भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 952

हिन्दी निरुक्त ( १८५ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० “इति- इमानि- एकादश- आप्रीसूक्तानि। तेषां वासिष्ठम्, आत्रेयं, वाध्यश्वं, गार्त्समदम्- इति नाराशंसवन्ति। मैधातिथं, दैर्घतमसं, प्रैषिकम्- इति- उभयवन्ति। अतोऽन्यानि तनूनपात्वन्ति तनूनपात्वन्ति”(नि०अ०८पा०३ खं०७) अर्थात्-ये ग्यारह आप्री सूक्त हैं। उन में- (१) वसिष्ठ ऋषि का सूक्त, (२) अत्रि ऋषि का सूक्त, (३) वध्यश्व ऋषि का सूक्त (४) गृत्समद् ऋषि का सूक्त,-ये चार सूक्त नाराशंस ] वाले हैं। (१) मेधातिथि का सूक्त, (२) दीर्घतमस् का सूक्त, (३) प्रैष सम्बन्धि ( परिशिष्ट वाला ) सूक्त ये तीन दोनों (तनूनपात् तथा नराशंस) देवताओं वाले हैं। [ १-४ ] इन से अन्य चार सूक्त तनूनपात् देवताओं वाले हैं। इन सब के परिज्ञान के अर्थ हम एक संक्षिप्त चित्र देते हैं, उससे पाठकों के प्रत्यक्ष में पूर्वोक्त सब अर्थ भले प्रकार से आजायगा । होतृ पठनीय १० सूक्त और उनके ऋषि आदि। (१) सुसमिद्धोन इत्यादि (१-१-२४) सूक्त १२ ऋचा- ओं का है। इसका काण्व मेधातिथि ऋषि और गायत्री छन्द है। इन सब ऋचाओं के क्रम से इध्मः, वा समिद्धोऽ- ग्निः आदि १२ देवता हैं। और पशु कर्म में कण्व गोत्रों का