भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 953

हिन्दी निरुक्त ( १८६ ) ८ अ० ३पा० ७खं आप्री सूक्त है । अर्थात्-उनके पशु कर्म में प्रयाज होमो' में होता इन मन्त्रो' को याज्या करता है ( पढता है ) ॥ ( २ ) समिद्धोऽग्न इत्यादि ( २-२-१०) सूक्त १३ ऋचाओं का है । इसका औचथ्य दीर्घतमा ऋषि और अनु- ष्टुप् छन्द है। यहां प्रथम ऋचा का समिध् (१) नामक अग्नि अथवा समिद्ध अग्नि देवता है । और द्वितीयादि ऋचाओं के तनूनपात् ( २ ), नराशंसः (३), इलः (४), बर्हिः (५), देवी- द्वारः (६), उषासानक्ता (७), दैव्यौ होतारौ प्रचेतसौ (८), ति- स्रो देव्यः ( ६ )-सरस्वतीलाभारत्यः, त्वष्टा (१०) वनस्पतिः ( ११ ) स्वाहाकृतिः ( १२ ),- ये क्रम से देवता हैं । अन्तिम ( १३वीं ) ऋचा का इन्द्र देवता है । 'देवीर्द्वारः' ये बहुत देवता हैं। उषासानक्ता और दैव्यौ होतारौ प्रचेतसौ, दो देवता हैं, तथा तिस्रो देव्यः ( तीन देवियें ) इसी की व्याख्या सरस्वती, इला और भारती, यह है । यहां एक स्थान में अनेक देवता भी एक देवता के रूप में समझे जाते हैं । यहां 'इध्म' (इन्धन) और 'तनूनपात्' ( आज्य = घृत ) आदि यज्ञ के अवयव या साधनरूप वस्तुओं से यज्ञ ही उक्त होता है, इस कारण उनके मन्त्रों का यज्ञ ही देवता है,-यह कात्थक्य आचार्य्य का मत है। समिध् आदि शब्दों से अग्नि ही उक्त होता है, अतः वही देवता है,- यह शाकपूर्णि का मत है । ( सा० भा० ) पशु कर्म में अङ्गिरो गोत्रोत्पन्नों का यह आप्रीसूक्त है ॥ ( ३ ) समिद्धोऽअद्य-इत्यादि ( अ २ अ०५ व८ ) सूक्त ११ ऋचाओं का है । इसका अगस्त्य ऋषि और गायत्री छन्द है। इसकी ११ ऋचाओं के क्रम से समिद्ध अग्नि और तनू-