निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १८७ ) ८ अ० ३ पा० ७ क नपात् आदि नराशंस वर्जित ग्यारह ( ११ ) देवता हैं, पशु- कर्म में अगस्त्य के गोत्रों का एकादश प्रयाज रूप यह आप्री सूक्त है ॥ ( ४ ) समिद्धोऽग्निः-इत्यादि ( अ० २ अ० ५ व २२ ) सूक्त ११ ऋचाओं का है । इसका गृत्समद ( शौनक ) ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द है । ७वीं ऋक् जगती छन्द है । समिद्ध अग्नि और तनूनपात्-वर्जित नराशंस आदि ११ देवता हैं । पशु कर्म में शुनकों का यह आप्री सूक्त है ॥ ( ५ ) समिसमित्-इत्यादि ( अ०२अ०८व२२ ) सूक्त ११ ऋचाओं का है । इसका विश्वामित्र ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द है । इध्म आदि स्वाहाकृतिपर्यन्त नराशंसवर्जित क्रम से ११ देवता हैं । पशु कर्म में विश्वामित्र गोत्रों का यह आप्रीसूक्त है । इस सूक्त की 'तनः'-यह ऋचा दर्श पौर्ण- मास यागों में पत्नीसंयाज होमों में त्वष्टा देवता की याज्या है । तथा यही ऋचा त्वष्टा देवता के पशु में पुरोडाश की अनुवाक्या है ॥ ( ६ ) सुसमिद्धाय-इत्यादि ( अ०३अ०४व२० ) सूक्त ११ ऋचाओं का है । इसका आत्रेय वसुश्रुत ऋषि और गा- यत्री छन्द है । इध्म आदि तनूनपात्-वर्जित ११ देवता हैं । पशु में अत्रिगोत्रों का यह आप्री सूक्त है । (७) जुषस्वनः-इत्यादि ( अ०६अ०७व२४ ) सूक्त ११ ऋचाओं का है । इसका वसिष्ठ ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द है। समिद्ध आदि तनूनपात्-वर्जित क्रम से प्रत्येक ऋचाओं के ११ देवता हैं । पशु में वसिष्ठ गोत्रों का यह आप्री सूक्त है ।