भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 955, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 955

हिन्दी निरुक्त ( १८८ ) ८ अ० ३ पा० ७ ख० तथा प्रथम ऋचा पत्नीसंयाज में त्वष्टा के याग की याज्या और त्वष्टा के पशु में पुरोडाश की अनुवाक्या भी है ॥ (८) समिद्ध-इत्यादि (अ० ६ अ० ७ व २४) सूक्त ११ ऋचाओं का है । इसका काश्यप असित अथवा देवल ऋषि ८वीं ६वीं १०वीं ११वीं इन चार ऋचाओं को अनुष्टुप् तथा शेष ७ ऋचाओं का गायत्री छन्द है । समिद्ध आदि नराशंस वर्जित प्रत्येक ऋचा के क्रम से ११ देवता हैं काश्यपों का पशु में यह आप्री सूक्त है ॥ (६) इमाम्-इत्यादि (अ० ८ अ० २ व २१) सूक्त ११ ऋचाओं का है । वाध्यश्व सुमित्र ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द है । समिध् आदि तनूनपात्-वर्जित क्रम से ऋचाओं के देवता हैं, वध्यश्व गोत्रों का पशु में यह आप्री सूक्त है ॥ (१०) समिद्धो अद्य मनुषो दुरोणे-इत्यादि (अ० ८ अ० ६ व ८) सूक्त ११ ऋचाओं का है । इसका भार्गव जमदग्नि अथवा उसका पुत्र राम जो परशुराम नाम से प्रसिद्ध है ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द है । समिध् आदि नराशंस वर्जित ११ देवता हैं । पशु में जामदग्न्यों का यह आप्रीसूक्त है ॥ (११) मैत्रावरुण पठनीय ११वां आप्री प्रैष सूक्त देवता मन्त्र (१) इध्मः । होतायक्षदग्नि समिधा सुसमिधा० वेत्वाज्यस्य होतर्यज ॥१॥ (२) तनूनपात् । होतायक्षत्तनूनपातमदितेर्गर्भे० वेत्वा० ॥२॥ (३) नराशंसः । होतायक्षन्नराशंसं नृशंसं नृः प्रशस्तं० वे- त्वा० ॥ ३ ॥