निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( १८८ ) ८ अ० ३ पा० ७ ख० तथा प्रथम ऋचा पत्नीसंयाज में त्वष्टा के याग की याज्या और त्वष्टा के पशु में पुरोडाश की अनुवाक्या भी है ॥ (८) समिद्ध-इत्यादि (अ० ६ अ० ७ व २४) सूक्त ११ ऋचाओं का है । इसका काश्यप असित अथवा देवल ऋषि ८वीं ६वीं १०वीं ११वीं इन चार ऋचाओं को अनुष्टुप् तथा शेष ७ ऋचाओं का गायत्री छन्द है । समिद्ध आदि नराशंस वर्जित प्रत्येक ऋचा के क्रम से ११ देवता हैं काश्यपों का पशु में यह आप्री सूक्त है ॥ (६) इमाम्-इत्यादि (अ० ८ अ० २ व २१) सूक्त ११ ऋचाओं का है । वाध्यश्व सुमित्र ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द है । समिध् आदि तनूनपात्-वर्जित क्रम से ऋचाओं के देवता हैं, वध्यश्व गोत्रों का पशु में यह आप्री सूक्त है ॥ (१०) समिद्धो अद्य मनुषो दुरोणे-इत्यादि (अ० ८ अ० ६ व ८) सूक्त ११ ऋचाओं का है । इसका भार्गव जमदग्नि अथवा उसका पुत्र राम जो परशुराम नाम से प्रसिद्ध है ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द है । समिध् आदि नराशंस वर्जित ११ देवता हैं । पशु में जामदग्न्यों का यह आप्रीसूक्त है ॥ (११) मैत्रावरुण पठनीय ११वां आप्री प्रैष सूक्त देवता मन्त्र (१) इध्मः । होतायक्षदग्नि समिधा सुसमिधा० वेत्वाज्यस्य होतर्यज ॥१॥ (२) तनूनपात् । होतायक्षत्तनूनपातमदितेर्गर्भे० वेत्वा० ॥२॥ (३) नराशंसः । होतायक्षन्नराशंसं नृशंसं नृः प्रशस्तं० वे- त्वा० ॥ ३ ॥
हिन्दी निरुक्त ( १८६ ) ८ अ० ३ पा० खं० ७ (४) ईलः । होतायक्षदग्निमीलींलितो०वेत्वा० ॥४॥ (५) बर्हिः । होतायक्षद्बर्हिः सुष्टरीमोर्णम्रदा० वेत्वों० ॥५॥ (६) द्वारः । होतायक्षहुँ ॠष्वाः० व्यंत्व० ॥६॥ (७) उषासानक्ता । होतायक्षदुषासानक्ता० वीतामाज्य- स्यः ॥ ७ ॥ (८) दैव्याहोतार। । होतायक्षदैव्याहोतार। ०वीतामाज्यस्य०॥८ (६) तिस्रोदेवीः । होतायक्षत्तिस्रोदेवीः२पसा० व्यन्त्वाज्य- स्य० ॥ ९ ॥ (१०) त्वष्टा । होतायक्षरैत्वष्टारमचिष्टमपाकं० वेत्वाज्यस्य०॥१० (११) वनस्पतिः । होतायक्षद्वनस्पतिमुपावस्रक्ष० वेत्वाज्य- स्य० ॥११॥ (१२) स्वाहाकृतयः । होतायक्षदग्निस्वाहाज्यस्यस्वाहामेदसः स्वाहा स्तोकानां स्वाहा स्वाहाकृ- तीनां स्वाहा० व्यंतु होतर्यज ॥१२॥ आप्री सूक्तों के विनियोग की व्यवस्था ॥ १ मकल्प । ,,समिद्धो अग्नि रिति शुनकानां जुषस्वनः समिधमिति वसिष्ठानां समिद्धो अद्येति सर्वेषाम्" (आश्व० ३,२) (१) "समिद्धो अग्निः" (ऋ० २- ऋ०५- व २२) यह सूक्त गृत्समद् या शुनकों के पशु कर्म में आप्री सूक्त होगा
हिन्दी निरुक्त ( १६७ ) ८ अ० ३. पा० ७ खं०
अर्थात् शुनक गोत्र यजमानों के पशु कर्म में एकादश प्रयाज देवताओं के यजन में होता- ऋत्विज् इस सूक्त की ग्यारह (११) ऋचाओं को याज्या करेगा । एक २ देवता के लिये एक २ ऋचा को क्रम से पढेगा । यह सूक्त पूर्वोक्त आप्री सूक्तों में ४ था है ॥ (२) “जुषस्वनः समिधम्” (ऋ० ३ अ० ८ व २०) यह सूक्त वसिष्ठगोत्रों का पशु कर्म में आप्री सूक्त होगा । यह दश आप्री सूक्तों में ७ वां है ॥ (३) “समिधो अद्य मनुषोदुरोणे” (ऋ०८ अ०६ व ८) यह सूक्त शुनकों और वसिष्ठों के अतिरिक्त सभी गोत्रों के लिये पशु कर्म में आप्री सूक्त होगा। दश आप्री सूक्तों में यह १० म है ॥ इस कल्प (विधान) में प्रयाज देवताओं के यजन में पूर्वो- क्त ऋग्वेद मन्त्र संहिता के दश (१०) आप्री सूक्तोंमें से तीन (३) आप्री सूक्तों का ही उपयोग होता है और सात (७) आप्री सूक्त रह जाते हैं, तथा इन तीन ही सूक्तों से सकल गोत्रों के,अनुष्ठान का निर्वाह होजाता है। क्यों कि- शुनकों के लिये चौथा सूक्त है; वसिष्ठों के लिये (७) सातवां सूक्त है । और सभी गोत्रों के लिये दशम सूक्त विहित हुआ है । अतः कोई गोत्र भी आप्री सूक्त से,रहित नहीं रहता है । किन्तु- जो यह दशम सूक्त अन्य सब गोत्रों के लिये विहित हुआ है उसमें तनूनपात् देवता की ऋचा है । नरा- शंस देवता की नहीं । इससे जो गोत्र नराशंस याजी हैं, अथवा उभययाजी हैं
हिन्दी निरुक्त (१६१) ८ अ० ३ पा० ७ खं० उनके लिये नराशंस दैवत की ऋचा ;अपेक्षित' होती है। वह कहां से लीजाय ' इस प्रश्न के उत्तर में आश्वलायन सूत्र के वृत्तिकार नारायण वासिष्ठी नाराशंसी ऋचा के ग्रहण को बताते हैं। वसिष्ठ का "जुषस्वनः" (अ०५ अ० २-व १ ) यह पूर्वोक्त सातवां सूक्त है, उसी से वह ऋचा लेनी चाहिये। २ यकल्प । "यथ ऋषि वा" (आश्व०३-२) जो जिस यजमान का ऋषि हो उसी ऋषि का उसको आप्री सूक्त लेना चाहिये। इसी पक्षमें भगवान् शौनक आप्री विवेक के लिए ही यह श्लोक देते हैं। कण्वोऽङ्गिरोगस्त्यशुनका विश्वामित्रोऽत्रिरेवच। वसिष्ठः कश्यपोवाध्युर्वा जमदग्नि रथोत्तमः” अर्थात् दश सूक्तों में- (१) कण्व गोत्रों का "सुसमिद्धो न आवह" [अ०१ अ०१- व २४) यह प्रथम आप्री सूक्त है ॥ [२] कण्ववर्जित अङ्गिरस् गोत्रों का "समिद्धो- अग्न आवह" (अ०२ अ०२ व १०) यह दूसरा आप्री सूक्त है ॥ (३) अगस्त्य गोत्रों का "समिद्धो अद्य राजसि" (अ०२ अ०५ व ८) यह तीसरा आप्री सूक्त है ॥ (४) गृत्समद या शुनकों का 'समिद्धो अग्निर्न'
हिन्दी निरुक्त ( १९२ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० हितः पृथिव्याम्” (अ०२ अ०५ व २२-) यह चतुर्थ आप्री सूक्त है ॥ (५) विश्वामित्र गोत्रों का “समित्समित्सुमनाः” (अ०२ अ०८ व२२) यह ५वां आप्री सूक्त है ॥ (६) आत्रेय वसुश्रुत गोत्रों का सुसमिद्धाय शोचिषे” (अ०३ अ०८ व१०) यह ६ठा आप्री सूक्त है ॥ [७] वसिष्ठ गोत्रों का “जुषस्वनःसमिधमग्नेअद्य” (अ०५ अ०१ व१ ) यह सातवां आप्री सूक्त है ॥ [८] काश्यप सित गोत्रों का “समिद्धोविश्वतस्पतिः” (अ०६ अ०७ व२४) यह आठवां आप्री सूक्त है ॥ (९) वाध्यश्व सुमित्र गोत्रों का “इमा॑मे अग्ने जुष- स्वेति” (अ०२ अ०२ व२१) यह ९वां आप्री सूक्त है ॥ (१०) शुनकों और वाध्यश्वों को छोड़ कर अन्य सबभृगु गोत्रों का “समिद्धो अद्य मनुषो दुरोणे” [अ०८ अ०६ व८) यह १० वा आप्रीसूक्त है ॥ ३ यकल्प विषय विशेष में । “प्राजापत्ये तु जामदग्न्यः सर्वेषाम्” (आश्वश्रौ०-३-२) १- प्रजापति देवता के पशु में सभी गोत्रों के लिये “समिद्धो अद्यमनुषो दुरोणे” (अ०८ अ०६- व.) यही एक आप्री सूक्त होता है । इस पक्षमें प्रथम और द्विती- य कल्प की विधियें बाधक नहीं होती हैं । इससे वसिष्ठ और शुनक आदि के लिये भी पूर्वोक्त आप्री सूक्तों की कोई आपत्ति न उठानी चाहिये ॥
हिन्दी निरुक्त ( १९३ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० यास्कने दशम सूक्त ही निरुक्त में क्यों लिया ? यास्क मुनि स्वयम् “इति इमानि एकादश आप्री- सूक्तानि” ऐसा उल्लेख करके यहां पर ग्यारह (११) आप्री सूक्तों को स्मरण कर रहे हैं, तथा उनमें से संहितास्थ दशम आप्री सूक्त को ही यहाँ पर इध्म आदि नामों के लिये निगम देते हैं। इस कारण यहां ऐसा प्रश्न स्वतः ही उत्पन्न होता है कि-जब सभी सूक्तों में इध्म आदि देवताओं के निगम विद्यमान हैं, तो अन्तिम सूक्त को ही वे क्यों लेते हैं इसका उत्तर हमें यही प्रतीत होता है, कि संहितास्थ अन्य सब सूक्त सब गोत्रों के लिये उपयुक्त नहीं होते किन्तु वे एक- एक गोत्र के लिए ही प्रयोजनीय होते हैं अतः सर्व प्रसिद्ध होने से यही सूक्त आचार्य ने उल्लिखित किया है। प्रैष सूक्त यद्यपि साधारण है तथापि जैसे (संहितास्थ) निगम प्रायः यहां दिये जाते हैं, उनसे वह विजातीय है, उसका देना भी उन्होंने उचित नहीं समझा। अथवा प्रैषसूक्त में जितने मन्त्र हैं उन सब में प्रधान देवता के नाम के अति- रिक्त प्रायः सब शब्द समान ही आते हैं इस लिए उन सब को उदाहृत करने से प्रति मन्त्र में छात्रों को विलक्षण २ अर्थों का लाभ न होगा, निर्वचन की सामग्री में अल्पता होगी और यहां पर व्यर्थ शब्दों का गौरव होगा। यही सब सोच विचार कर आचार्य ने संहितास्थ दशम सूक्त ही यहां पर दिया है॥ “प्रैष सूक्त और दश सूक्तों का सम्बन्ध” पशु कर्म में जहां ग्यारह प्रयाज होम होते हैं, वहां प्रथम
हिन्दी निरुक्त (१६५) ८ अ० ३ पा० ७ खंड
के अर्थ “प्रेष्य” एतावन्मात्र ही मन्त्र पढ़ेगा किन्तु प्रथम मन्त्र के समान देवता का चतुर्थ्यन्त नाम उसके पूर्व में उच्चारण नहीं करेगा, यह विशेष विधि “आपस्तम्ब” महर्षि कहते हैं- “समिद्भ्यः प्रेष्येति प्रथमं संप्रष्यति प्रेष्य प्रेष्ये- तीतरान् इति” जामदग्न्य सूक्त में अन्य ऋचाएं और उनका प्रयोजन यास्काचार्य ने यहां आप्री देवताओं के निर्वचन प्रकरण में दश आप्रीसूक्तों में से जामदग्न्य ही आप्रीसूक्त दिया है। यह सूक्त ऋग्वेद संहिता में अन्य सब आप्रीसूक्तों में अन्तिम है। इसके चुनाव का प्रयोजन पहिले दिया जा चुका है, अब उसके बीच २ में कुछ और ऋचाएं भी दी गई हैं उनका प्रयोजन भी ज्ञातव्य है, इसी से नीचे उनका प्रयोजन कहा जाता है -- (१) जिस प्रकार आचार्य ने सर्व प्रधान देवताओं के व्याख्यान के अनुरोध से सम्पूर्ण इध्म आदि आप्री देवताओं के नामों का अपने निघण्टु ग्रन्थ में संग्रह किया है, तथा जिस प्रकार सर्वगोत्री याजकों के अनुष्ठानोपयोग के अनुरोध से उन्होंने जामदग्न्य आप्रीसूक्त ही निगम स्थान में रखा है, उसी प्रकार क्रमागत नराशंस देवता के निर्वचन के अनु- रोध से उन्हें नराशंस देवता का भी निगम देना योग्य है। क्योंकि प्रकृत जामदग्न्य सूक्त में नराशंस देवता की ऋचा
हिन्दी निरुक्त ( १६६ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० का अभाव है, इससे उन्होंने वसिष्ठगोत्रों के “जुषस्वनः” (अ० ५ क्र० २ व १ ) आप्री सूक्त से उक्त देवता की ऋचा का यहां पर समावेश किया । यहां पर आचार्य के इस नारा- शंसी ऋचा के चुनाव का यह और भी महत्त्व है कि अन्य पांच सूक्तों में अन्य २ पांच नाराशंसी ऋचाओं के होने पर भी आप वासिष्ठी नाराशंसी ऋचा का ही आहरण करते हैं इस में विधि का अनुग्रह भी होता है। अर्थात्- जब नराशंस- याजी कोई गोत्र जामदग्न्य सूक्त की आप्री सूक्त करते हैं, तब उन्हें विधि के अनुसार वासिष्ठी नाराशंसी ही लेनी पड़ती है, किन्तु अन्य नाराशंसी नहीं। यद्यपि यहां निर्व- चन के प्रयोजन से वासिष्ठी तथा अन्य नाराशंसी में कोई फल भेद नहीं, तथापि एक कार्य के साथ एक ही यत्न से आवश्यक कार्योन्तर की सिद्धि भी की गई है, यह आचार्य के विचार कौशल का महत्त्व ही है। इस वासिष्ठी नाराशंसी ऋचा को यहां समावेश करने के सम्बन्ध में नारायण वृत्ति- कार खण्डसूत्र ( ३, २ ) पर यों कहते हैं, कि- “तत्रात्र्यादीनां नाराशंस्थेव वासिष्ठ्या हर्तव्या, प्रैष सालिङ्गाभिरित्युक्तत्वात्” अर्थात्- अत्रि आदिकों को जब प्रथम कल्प या तृतीय कल्प के अनुसार जामदग्न्य आप्री सूक्त लेना होगा, तब वे नाराशंस याजी होने के कारण नाराशंसी ऋचाकी अपेक्षा करेंगे, तथा प्रकृत सूक्त में वह ऋचा है नहीं, अतः उन्हें और कहीं से नाराशंसी ऋक् लानी होगी, उस अवस्था में नारायण कहते हैं कि उन्हें वासिष्ठी (वसिष्ठ सूक्त अ० ५- अ० २ व १ से) नाराशंसी ही लानी चाहिये, क्यों कि- सूत्र-
हिन्दी निरुक्त ( १६७ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० कार “होता यजत्याप्रीभिः प्रैषसलिङ्गाभिः” (आश्व० ३, २) इस सूत्र में कहते हैं कि— होता को यजन में ऐसी आप्री ऋचाएं लेनी चाहिये, जो मैत्रावरुण के प्रैष मन्त्रों के समानलिङ्ग हों— “होता यक्षद् ०” इत्यादि मन्त्र जिस क्रमसे जिस २ देवता के मैत्रा वरुण के द्वारा पठित हों, उसी क्रम से उस २ देवता की आप्री संज्ञकयाज्याकोवह पढे। नारायण समझते हैं कि- व्याकरण में जिस प्रकार “स्थानेऽन्तरतमः” (पा० सू ) सूत्र में जितना ही स्थानी और आदेशका सादृश्य मिले, उतना ही लेना चाहिये, उसी प्रकार जहां तक हो, आप्री मन्त्र प्रैष मन्त्र के सदृश हों ।अभिप्राय केअनुसार अन्य नारा- शंसी ऋचाओं की अपेक्षा वासिष्ठी नाराशंसी ऋचा में नराशंस के प्रैष मन्त्र का अधिक सादृश्य है, इससे वासिष्ठीनाराशंसी काही आवाप (समावेश) करना चाहिये । इस अर्थ में नारायण वृत्तिकार के अभिमत के सहायक यास्क मुनि भीबनते हैं, क्यों कि— उन्हों ने भी जामदग्न्य आप्री सूक्त में वासि- ष्ठी नाराशंसी ऋचा का आहरण किया है । यद्यपि “प्रैष सलिङ्गाभिः” (आ० ३, २) इसमें देवता और पाठ क्रम दोका सादृश्य तो स्थूलतर है ही, जिसके अनुसार प्रैष मन्त्रों और आप्री मन्त्रों का क्रम अनुष्ठान में समान रहता है । किन्तु ये दो सादृश्य वासिष्ठी नाराशंसी के समान अन्य २ आप्री नाराशंसियों में भी हैं । वासिष्ठी में जो अन्य ऋचाओं की अपेक्षा अधिक सादृश्य है, उसके लक्षित करने के लिये हम नीचे प्रैष मन्त्र तथा सब नाराशंसी आप्री ऋचाओं को स्वरूपतः उद्धृत करदेते हैं, प्रज्ञाता पुरुष उन्हें प्रत्यक्ष करके सादृश्या कनिरूपणभी करसकेंगे—
हिन्दी निरुक्त ( १६८ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० (१) नराशंस का \ “होता यक्षन्नराशंसं नृशंसं नॄंः प्रैषमन्त्र { प्रणेतं । गोभिर्वैपावान्त्स्याद्वारैः { शक्तीवान्प्रथैः प्रथमयावा हिरण्यै- { श्रन्द्री वेत्वाज्यस्य होतर्यज” ।३। (२) काण्व मेधा- \ “नराशंसमिह प्रियमस्मिन्यज्ञऽ तिथि उभययाजी { उपह्वये । मधुजिह्वं हविष्कृतम्” । की नाराशंसी { (अ०१अ०१व२४) आप्री / (३) औचथ्य दीर्घ- \ “शुचिः पावकोऽअद्भुतो मध्वायज्ञं तमा उभययाजी { मिमिक्षति। नराशंस स्त्रिरादिवो की नाराशंसी { देवो देवेषु यज्ञियः।(अ०२अ०२व१०) आप्री / (४) गृत्समद शु- \ नराशंसः प्रतिधा मान्यंजन्र्तिस्रो नक नराशंस याजी { दिवः प्रतिमन्हा स्वर्त्तिः। घृतप्रुषा की आप्री { मनसा हव्यमुंदन्मूर्धन्यज्ञस्य समनक्तु देवान्। (अ०२अ०५व२२) (५) आत्रेय वसु- \ नराशंसः सुषूदतीमं यज्ञमदाभ्यः श्रुत नराशंस- { कवि र्हिं मधुहस्त्यः ॥ (अ० ३ याजी की आप्री / अ० ८ व २० ) (६) मैत्रावरुणि \ नराशंसस्य महिमानमेषा मुपस्तो- वसिष्ठ नराशंस- { षाम यजतस्ययज्ञैः। ये सुक्रतवः याजी की आप्री { शुचयो धियंधाः स्वदन्ति देवाऽ / उभयानिहव्या। (अ०५अ०२व१)
हिन्दी निरुक्त ( १६६ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० $(७) वाध्यश्व सु- मित्र नराशंस- याजी की आप्री$ $आ देवानां मन्मथा वोह्य१स्तु नरा- शंसो विश्वरूपेभिरश्वैः। ऋतस्य पथा नमसामियेधो देवेभ्यो देवतमः सुषदत् ॥ (अ०८अ०२व२१)$ (२) 'त्वष्टा' १० वां आप्री देवता है। उसके निर्वचन में जामदग्न्य सूक्त की "यहमे०" (अ० ८ अ० ६ व० ६) जो यह ऋचा दी है। उसमें त्वष्टा का नामोल्लेख यद्यपि है तथापि उसके स्वरूप का निरुपण कुछ भी नहीं, है अतः उसके स्वरूप बोधन के लिये दूसरी ऋचा (अ० १ अ० ७ व० १) का उल्लेख आचार्य को आवश्यक हुआ। इस ऋचा में प्रकाशन और ऊर्ध्वज्वलन पार्थिव अग्नि के स्पष्ट बोधक हैं। (३) वनस्पति आप्री देवता का दूसरा, तीसरा और चौथा निगम। क्यों कि- वनस्पति कात्थक्य के मत से यूप और शाकपूर्णि के मत में अग्नि है, तथा जामदग्न्य आप्री सूक्त की ऋचा जो प्रथम निगम के स्थान में दी है, वह किसी एक मत को भी पुष्ट नहीं करती अतः दूसरा निगम यूप रूप को और तीसरा तथा चौथा निगम अग्नि रूप का बोधन करने के लिये दिया गया है॥ भाष्यकार की एक पङ्क्ति। भाष्यकार यास्क मुनि इस अध्याय के अन्त में "इति इमानि एकादश आप्रीसूक्तानि" ऐसा लिखते हैं जिससे यह प्रतीत होता है जैसे वे ग्यारहों आप्रीसूक्तों का यहां उपप्रदर्शन करा चुके हैं और उनकी कोई विशेष व्य-
हिन्दी निरुक्त (२००) ८ अ० ३पा० ७खं वस्था दिखाने के अर्थ उनका उपादान करते हैं । किन्तु यहाँ एक ही जामदग्न्य सूक्त है। क्यों कि- “इमानि” यह 'इदम्' शब्द है । इस शब्द का प्रयोग संमुख प्रत्यक्ष वर्त्तमान वस्तु के अङ्गुलि निर्देश पूर्वक दिखाने के लिये होता है । अतः यहां पर यह मानना चाहिये कि- क्या तो यहां से वह ग्रन्थ त्रुटित होगया; या किसी ने भ्रान्तिवश 'इत्यादीनि' पदके स्थान में “इतीमानि” कर दिया । दोनों ही संभव हैं तथापि द्वितीय पक्ष का अधिक संभव है । कारण प्रथम पक्ष में एक प्रकरण का लोप प्राप्त होता है, जिसका द्वितीय पक्षकी अपेक्षा होना बहुत कठिन है ॥ निरुक्त के अष्टम अध्याय का खण्ड सूत्र— (१मपा०-) द्रविणोदाः कस्मात् (१) द्रविणोदा द्रविणोदसः (अयमेवाग्निः) (२) मेद्यन्तुते (३) (२य पा०-) अथात आप्रियः (४) समिधो अद्य (५) तनूनपात् (६) नराशंसस्य (७) आजुह्वानः (८) प्राचीनं बर्हिः (६) व्यचस्वती (१०) आसुष्वयन्ती (११) दैव्याहोतारा (१२) आनोयज्ञम् (१३) यह्मे (१४) आविष्ठद्यः (१५) [३य पा०-] वनस्पतिः (१६) उपावसृज (१७) आज्जन्ति- त्वा (१८) देवेभ्यः (१९) वनस्पते रशनया (२०) सद्योजातः (२१) प्रयाजान्मे (२२) इति निरुक्ते (उत्तर षट्के ) अष्टमोऽध्यायः ॥८, ३॥ इति हिन्दी निरुक्ते (उत्तरषट्के) अष्टमोऽध्यायः समाप्तः॥८,३॥ —:ॐ:—
अथ नवमोध्यायः ॥६॥ प्रथमः पादः ( खं० १ ) ( अथ षट् त्रिंशत् (३६) पदानि ) निघ०-अश्वः ॥१॥ शकुनिः॥२॥ मण्डू- काः ॥३॥ ऋताः ॥४॥ ग्रावाणः ॥५॥ नाराशंसः ॥६॥ निरु०-अथ यानि पृथिव्यायतनानि सत्त्वानि स्तुतिं लभन्ते तानि अतोऽनुक्रमिष्यामः । तेषाम्-‘अश्व’ प्रथमागामी भवति । ‘अश्वो’ व्याख्यातः । तस्य एषा भवति ॥१॥ अर्थः-“अथ०” यहांसे जो पृथिवी स्थान = पृथिवी में रहने वाले सत्त्व = द्रव्य स्तुति को प्राप्त होते हैं, उनको यहां से आगे अनुक्रमण करेंगे = क्रम २ से कहेंगे । उनमें ‘अश्व’ स्वभाव से पहिले आने वाला है । ‘अश्व’ यह पद व्याख्यान किया जाचुका [ अ० २ पा० ७ खं० ५ ] ॥ उसकी यह ऋचा है- ॥१॥ व्याख्या ‘अथ” यह अधिकार वचन है । पूर्व आप्री देवताओं से यह ‘अश्व आदि (३६) द्रव्य विलक्षण हैं- भिन्न प्रकार हैं इससे इनका अलग अधिकार कियागया ।
हिन्दी निरुक्त ( २७२ ) ६ अ० १ पा० १ खं० इनकी भी मन्त्रों में स्तुति आती है, इस लिये इनकी समाम्नाय में गणना की गई है । पृथिवी में रहने वाले हैं, इस लिये पृथिव्यायतन देवता- ओं के गणमें इनका पाठ है । पृथिवी स्थान के सादृश्य से इन्हीं के भीतर सर्प लाङ्गल और कुषुम्भक आदि भी समझने चाहिएं । क्यों कि- इनकी भी मन्त्रों में स्तुति आती है । यहां पर शब्दों के पाठ का क्रम अर्थस्वभाव = वस्तु- स्वभाव से अङ्गीकार किया हुआ है । क्रम की व्यवस्था होने पर मुख्य का परित्याग न्याय- सङ्गत नहीं है । इसी से आचार्य कहता है- “तेषामश्वः प्रथमागामी०” । 'अश्व' क्यों प्रथम है ? पुरुष के बाद इसका जन्म है- “तस्या आहुत्याः पुरुषोऽजायत, द्वितीयामजु- होत् ततोऽश्वोऽजायत” अर्थात्- 'उस आहुति से पुरुष हुआ, दूसरी का होम किया उससे अश्व हुआ' यह ब्रा० वा- क्य है । और विशेष प्रकार के "अश्वमेध" कर्म में इसका विशेष अङ्गभाव = उपयोग है । इस कारण भी औरों की अपेक्षा यह मुख्य है । “अश्वो व्याख्यातः” वहां पर अश्नुते अध्वानम्” मार्ग को व्यापन करता है, “महाशनो भवतीतिवा” अथवा बड़ा भोजन करने वाला है, इससे यह 'अश्व' है । ऐसी व्याख्या की गई है ॥१॥
हिन्दी निरुक्त ( २०३ ) ६ अ० १ पा० २ खं० (खं० २) निरु०- "अश्वो वोळ्हा सुखं रथं हसनामुप- मन्त्रणः । शेपो रोमण्वन्तौ भेदौ वारिन्मण्डूक इच्छतीन्द्रायेन्दो परिस्रव ॥" [अ०७ अ०५ व२५] ॥ अश्वो वोळ्हा सुखं वोळ्हा रथं वोढा । 'सुखम्' इति कल्याणनाम । कल्याणं पुण्यं सुहितं भवति । सुहितं गम्य (मय) ति इतिवा हसै िसि ता वा । [पातावा । पालयितावा ।] शेपम्- ऋच्छति- इति । 'वारि' वारयति । "मानो" व्याख्यातः ॥ तस्य- एषा (अपरा) भवति ॥२॥ (खं० ३) "मानो मित्रो वरुणो अर्यमायुरिन्द्र ऋभुक्षा मरुतः परिख्यन् । यद्वाजिनो देवजातस्य सप्तेः प्रवक्ष्यामो विदथे वीर्याणि ॥" [ऋ० सं०२,३,७,१]॥ यद् वाजिनो दैवै र्जातस्य 'सप्तेः' सरणस्य प्रव- क्ष्यामो यज्ञे 'विदथे' वीर्याणि, मानः त्वं मित्रश्च वरुणश्च अर्यमाच 'आयु'श्च वायुः अयनःइन्द्रश्च उरुक्षयणः । ऋभूणां राजा- इतिवा । मरुतश्च परिख्यन् ॥
हिन्दी निरुक्त ( २०४ ) ६ अ० १ पा० ३ खं 'शकुनिः' शक्नोति उन्नेतुम्- आत्मानम् । शक्नोति नदितुम् इतिवा । शक्नोति तक्तितुम्- इतिवा । सर्वतः शङ्करः अस्तु-इतिवा शक्नोतेर्वा ॥ तस्य एषा भवति- ॥३॥ अर्थः- “अश्वो वोल्हा” हे 'इन्दो' सोमः 'मन्त्रियाः' (मन्त्रप्रतिपाद्यस्य इन्द्रस्य) मन्त्र से प्रतिपादन करने योग्य इन्द्र देव का 'अश्वः' घोड़ा 'सुखम्' सुखसे 'रथम्' रथ को वोल्हा (वोढा) खेंचने वाला 'हसनाम्' (हसिताम् = इसनशी- लाम्) हिनसने वाली (घोड़ी) को 'उप' (श्लिष्य) आलिङ्गन करके = उसके साथ चिपटकर 'शेपः' (शेपम्- ऋच्छति) पुरुष चिन्हको प्राप्त होता है प्रचलित करता है । 'भेदौ' उस अश्वके दो भेद हैं [क्यों कि- “हरी इन्द्रस्य” 'इन्द्र के 'हरि' नाम वाले या हरे दो घोड़े हैं' यह निघ, अ० १ खं० १५ में कहा है।] या वे दो शत्रुओं के भेदन करने वाले हैं, और 'रोमशवन्तौ' सांड हैं । (क्यों कि- “लोमशः पुरुषः स्मृतः” लोम = रोम = लिङ्ग इन्द्रिय वाला पुरुष होता है, यह पुरुष का लक्षण है ।) 'मण्डूकः' मेंढक 'वारित' (वारि) जल को 'इच्छति' चाहता है । अर्थात्- अश्व का रथ के लेचलने का सामर्थ्य और मेंढक की प्यास का मिटना वर्षा के द्वारा तेरे अधीन है । इस कारण हे सोम (त्वम्) तू 'इन्द्राय' इन्द्र के लिये 'परि- स्रव' झर । प्रयोजन यह कि-हे सोम तेरे झरने से यज्ञ होगा, यज्ञ से वृष्टि, और वृष्टि से घास अन्न आदि । इस प्रकार
हिन्दी निरुक्त (२०५) ६ अ० १ पा० ३ खं० केवल जल से जीने वाले तथा तृण आदि से जीने वाले सभी प्रकार के प्राणियों का उपकार तेरे अधीन है। अतः तू क्षम। [यह सोम से प्रार्थना है।] ॥ दूसरी व्याख्या- 'मन्त्रिणः' (मन्त्रवतः यजमानस्य) दीक्षा प्राप्त यजमान का 'अश्वः'घोड़ा 'हसनाम्' (हसनवतीं यजमान- पत्नीम्) हँसती हुई यजमान की पत्नी को 'उप' (श्लिष्य) समीप में लग कर 'शेपम्' चिन्ह को 'ऋच्छति' प्राप्त होता है या प्रचलित करता है। और सब उक्त प्रकार से है। इस अर्थ में "अश्वमेध" यज्ञ में यजमान पत्नी और अश्व के संबन्ध को लेकर जो क्रिया होती है उसका स्मरण होता है जैसा कि- [का०२०, ६, १६- ] "अश्व शिश्नमुपस्थे कुरुते वृषावाजीति" ॥ 'सुख' यह कल्याण का नाम है। 'कल्याण' पुण्य होता है। 'सुख' क्यों ? वह सुहित = सुन्दर हित होता है। अथवा सुहित को प्राप्त कराता है। (पहिले पक्षमें 'सुख' नाम सुख का ही है और दूसरे पक्षमें सुख के साधन का नाम सुख है।) 'हसना' क्या ? हसिता = हँसने वाली। (अथवा पाता = पालयिता या रक्षा करने वाला।) 'वारि' क्यों ? वह 'वारयति' तृषा = प्यास को बुझा- ता है। "मानो व्याख्यातः" [ यह अपपाठ है । ] "तस्य०" उस (अश्व) की (और) यह ऋचा है ॥२॥ व्याख्या। इस खण्ड की जो व्याख्या ऊपर की गई है, वह यथा
हिन्दी निरुक्त ( २०६ ) ६ अ० १ पा० ३ खं० संभव सबके अक्षरों के सहारे पर है। इस की व्याख्या भग- वद्दुर्गाचार्य की टीका में भी नहीं मिलती है, किन्तु इस से यह प्रक्षिप्त नहीं समझा जासकता, कारण इस का प्रतीक इसी अध्याय के खण्ड सूत्र में वर्त्तमान है। सर्वथा खण्ड का होना प्रमाणित होता है। भगवद् दुर्गाचार्य की व्याख्या के न होने का कारण यह भी हो सकता है कि वर्त्तमान के समान उनके समय में भी इस खण्ड का पाठ अस्तव्यस्त रहा हो और उन्होंने इस की व्याख्या की उपेक्षा करदी हो। मं० “ह्मनामुपमन्त्रिणः शेपः” भा०- “शेपमृ- च्छति” पहिले मन्त्र खण्ड के ‘मन्त्रिणः’ पदको ‘रथम्’ के साथ जोड़ा जासकता है,जिससे मन्त्रिणः रथं वोढा' मन्त्री = मन्त्र का आराध्य देव = इन्द्र के अथवा मन्त्रवान् यजमान के रथको खैंचने वाला (अश्व) ऐसी योजना होजाती है। और ‘शेपः’ इस प्रथमान्त को ‘शेपम्’ द्वितीयान्त करके ‘ऋच्छति’ पद का भाष्यकार ही अध्याहार करते हैं, तदनु- सार ‘हसनाम्-उप (श्लिष्य) शेप. = शेपम् ऋच्छति’— ह्मना = ह्सनशीला-हिनसने वाली (घोड़ी) को आलिङ्गन करके शेप (पुरुष चिन्ह) को प्राप्त होता है। क्योंकि उसके संगसे ही उसका चिन्ह बढ़ता है, और वही उस की प्राप्ति भी है। नीचे भाष्य में इसी ‘हसना’ पद का ‘हसिता’ पद से निर्वचन भी किया है, जो ‘हसित’ शब्द का स्त्रीलिङ्ग में संभव है। मूलपाठ में ‘हसेता’ पद है, वह ‘हसिता’ से ही बिगड़ा हुआ हो सकता है। उसके आगे जो ‘पाता’ और ‘पालयिता’ ये दो पद निर्वचन सूत्र में हैं, वे अन्य पदों की
हिन्दी निरुक्त (२०७) ६ अ० १ पा० ३ खं०
व्याख्या टूट कर के लेखक के अज्ञान से यहां आए हुये हो सकते हैं। क्योंकि-स्त्रीलिङ्ग का निर्वचन पुंल्लिङ्ग पदसे नहीं हो सकता और न उनके अर्थ की संगति ही होती है। पूर्व खण्ड के अन्तमें-“अश्वो व्याख्यातस्तस्यैषा भवति”। इस द्वितीय खण्ड के अन्त में-“मानो व्याख्यातः तस्य एषा भवति”। तीसरे खण्ड के आदि में-“मानो मित्रो०” (मन्त्र) पाठ है। इन तीनों पाठों में पहिले को यथास्थित, और दूसरे के स्थान में 'तस्य एषा अपरा भवति' ऐसा पढ़ने से तीसरा पाठ स्वयम् समन्वित होता हुआ दिखाई देता है। क्योंकि-दूसरी ऋचा (मानो मित्रो०) भी अश्वकी ही स्तुति में है। प्रयोजन यह कि-जब नवमाध्याय के खण्डसूत्र में “अ- श्वो वोढा” इस खण्ड प्रतीक को प्रमाण मानते हैं, तब “अश्वो वोढा” इस द्वितीय खण्ड से “पाता वा पा- लयितावा तथा “मानो व्याख्यातः” इन दोनों पाठों को अलग करके और “तस्यैषा भवति” इसके स्थान में 'तस्यैषाऽपरा भवति' ऐसा सुधार करके उक्त खण्ड (निरु० ६ अ० १ पा० २ खं०) को पढ़ना चाहिये। एवम् जब भग- वद्दुर्गाचार्य की टीका का अनुरोध करते हैं, तब इस द्वितीय खण्ड को ही अलग करके प्रथम खण्ड के अनन्तर तृतीय खण्ड को ही पढ़ेंगे।
हिन्दी निरुक्त ( २०८ ) ३ अ० १ पा० ३ खं० “पातावा\पालयितावा” यह प्रथम अपपाठ लेखक की भ्रान्ति से प्रक्षिप्त हुआ प्रतीत होता है। और “मानोव्या- ख्यात स्तस्यैषा भवति” यह किसी दुर्बुद्ध पुरुष के द्वारा सुधारा हुआ प्रतीत होता है। क्यों कि नतो उसने निघण्टु के मूल पाठ ही पर ध्यान दिया और न इस शब्द का जो उसने निगम समझा है “मानो मित्रो वरुणः” इत्यादि मन्त्र, उसके अर्थ को ही समझा, किन्तु उसने अपनी अदीर्घ बुद्धि से “अश्वो व्याख्यातस्तस्यैषा भवति”— “अश्वो वोढा” इसकी तुकबन्धी को देख कर तथा “मानो मित्रो वरुणः” इस ऋचा को अनुपयुक्त देख कर सोचा कि–पूर्व निर्दिष्ट ऋचा के आद्य शब्द के लिये जैसा लिखा हुआ है, वैसाही इस दूसरे मन्त्र के आद्य शब्द (मानः) के लिये भी क्यों न हो ? यदि वह निघण्टु की ओर दृष्टि ले जाता, तो निघण्टु मे ‘अश्वः’ शब्द के अनन्तर ‘शकुनिः’ यह दूसरा शब्द है, उसकी व्याख्या– ‘शकुनिः शक्नोत्युन्नेतुम्’– इत्यादि ग्रन्थ से आगे करही रखी है। यदि मन्त्रार्थ पर ध्यान देता, तो “मानः” यह कोई देवता का नाम नहीं और न प्रकृत ग्रन्थ में प्रसक्त तथा प्रसक्तानुप्रसक्त ही है, जिस से कि–इसकी व्याख्या अपेक्षित होती । बल्कि– ‘मानः’ ये दो शब्द हैं पहिला ‘मा’ (मत) और दूसरा ‘नः’ (हमको) । इस प्रकार यहां पर ‘मानः’ यह कोई एक शब्द नहीं होता । तथा यदि मन्त्र के अर्थ पर ही ध्यान देता तो मन्त्र में अश्व की ही स्तुति है और वह अश्व का ही निगम बनता है ।