निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 974, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २०८ ) ३ अ० १ पा० ३ खं० “पातावा\पालयितावा” यह प्रथम अपपाठ लेखक की भ्रान्ति से प्रक्षिप्त हुआ प्रतीत होता है। और “मानोव्या- ख्यात स्तस्यैषा भवति” यह किसी दुर्बुद्ध पुरुष के द्वारा सुधारा हुआ प्रतीत होता है। क्यों कि नतो उसने निघण्टु के मूल पाठ ही पर ध्यान दिया और न इस शब्द का जो उसने निगम समझा है “मानो मित्रो वरुणः” इत्यादि मन्त्र, उसके अर्थ को ही समझा, किन्तु उसने अपनी अदीर्घ बुद्धि से “अश्वो व्याख्यातस्तस्यैषा भवति”— “अश्वो वोढा” इसकी तुकबन्धी को देख कर तथा “मानो मित्रो वरुणः” इस ऋचा को अनुपयुक्त देख कर सोचा कि–पूर्व निर्दिष्ट ऋचा के आद्य शब्द के लिये जैसा लिखा हुआ है, वैसाही इस दूसरे मन्त्र के आद्य शब्द (मानः) के लिये भी क्यों न हो ? यदि वह निघण्टु की ओर दृष्टि ले जाता, तो निघण्टु मे ‘अश्वः’ शब्द के अनन्तर ‘शकुनिः’ यह दूसरा शब्द है, उसकी व्याख्या– ‘शकुनिः शक्नोत्युन्नेतुम्’– इत्यादि ग्रन्थ से आगे करही रखी है। यदि मन्त्रार्थ पर ध्यान देता, तो “मानः” यह कोई देवता का नाम नहीं और न प्रकृत ग्रन्थ में प्रसक्त तथा प्रसक्तानुप्रसक्त ही है, जिस से कि–इसकी व्याख्या अपेक्षित होती । बल्कि– ‘मानः’ ये दो शब्द हैं पहिला ‘मा’ (मत) और दूसरा ‘नः’ (हमको) । इस प्रकार यहां पर ‘मानः’ यह कोई एक शब्द नहीं होता । तथा यदि मन्त्र के अर्थ पर ही ध्यान देता तो मन्त्र में अश्व की ही स्तुति है और वह अश्व का ही निगम बनता है ।