निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 973, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (२०७) ६ अ० १ पा० ३ खं०
व्याख्या टूट कर के लेखक के अज्ञान से यहां आए हुये हो सकते हैं। क्योंकि-स्त्रीलिङ्ग का निर्वचन पुंल्लिङ्ग पदसे नहीं हो सकता और न उनके अर्थ की संगति ही होती है। पूर्व खण्ड के अन्तमें-“अश्वो व्याख्यातस्तस्यैषा भवति”। इस द्वितीय खण्ड के अन्त में-“मानो व्याख्यातः तस्य एषा भवति”। तीसरे खण्ड के आदि में-“मानो मित्रो०” (मन्त्र) पाठ है। इन तीनों पाठों में पहिले को यथास्थित, और दूसरे के स्थान में 'तस्य एषा अपरा भवति' ऐसा पढ़ने से तीसरा पाठ स्वयम् समन्वित होता हुआ दिखाई देता है। क्योंकि-दूसरी ऋचा (मानो मित्रो०) भी अश्वकी ही स्तुति में है। प्रयोजन यह कि-जब नवमाध्याय के खण्डसूत्र में “अ- श्वो वोढा” इस खण्ड प्रतीक को प्रमाण मानते हैं, तब “अश्वो वोढा” इस द्वितीय खण्ड से “पाता वा पा- लयितावा तथा “मानो व्याख्यातः” इन दोनों पाठों को अलग करके और “तस्यैषा भवति” इसके स्थान में 'तस्यैषाऽपरा भवति' ऐसा सुधार करके उक्त खण्ड (निरु० ६ अ० १ पा० २ खं०) को पढ़ना चाहिये। एवम् जब भग- वद्दुर्गाचार्य की टीका का अनुरोध करते हैं, तब इस द्वितीय खण्ड को ही अलग करके प्रथम खण्ड के अनन्तर तृतीय खण्ड को ही पढ़ेंगे।