निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २०६ ) ६ अ० १ पा० ३ खं० संभव सबके अक्षरों के सहारे पर है। इस की व्याख्या भग- वद्दुर्गाचार्य की टीका में भी नहीं मिलती है, किन्तु इस से यह प्रक्षिप्त नहीं समझा जासकता, कारण इस का प्रतीक इसी अध्याय के खण्ड सूत्र में वर्त्तमान है। सर्वथा खण्ड का होना प्रमाणित होता है। भगवद् दुर्गाचार्य की व्याख्या के न होने का कारण यह भी हो सकता है कि वर्त्तमान के समान उनके समय में भी इस खण्ड का पाठ अस्तव्यस्त रहा हो और उन्होंने इस की व्याख्या की उपेक्षा करदी हो। मं० “ह्मनामुपमन्त्रिणः शेपः” भा०- “शेपमृ- च्छति” पहिले मन्त्र खण्ड के ‘मन्त्रिणः’ पदको ‘रथम्’ के साथ जोड़ा जासकता है,जिससे मन्त्रिणः रथं वोढा' मन्त्री = मन्त्र का आराध्य देव = इन्द्र के अथवा मन्त्रवान् यजमान के रथको खैंचने वाला (अश्व) ऐसी योजना होजाती है। और ‘शेपः’ इस प्रथमान्त को ‘शेपम्’ द्वितीयान्त करके ‘ऋच्छति’ पद का भाष्यकार ही अध्याहार करते हैं, तदनु- सार ‘हसनाम्-उप (श्लिष्य) शेप. = शेपम् ऋच्छति’— ह्मना = ह्सनशीला-हिनसने वाली (घोड़ी) को आलिङ्गन करके शेप (पुरुष चिन्ह) को प्राप्त होता है। क्योंकि उसके संगसे ही उसका चिन्ह बढ़ता है, और वही उस की प्राप्ति भी है। नीचे भाष्य में इसी ‘हसना’ पद का ‘हसिता’ पद से निर्वचन भी किया है, जो ‘हसित’ शब्द का स्त्रीलिङ्ग में संभव है। मूलपाठ में ‘हसेता’ पद है, वह ‘हसिता’ से ही बिगड़ा हुआ हो सकता है। उसके आगे जो ‘पाता’ और ‘पालयिता’ ये दो पद निर्वचन सूत्र में हैं, वे अन्य पदों की