भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 971

हिन्दी निरुक्त (२०५) ६ अ० १ पा० ३ खं० केवल जल से जीने वाले तथा तृण आदि से जीने वाले सभी प्रकार के प्राणियों का उपकार तेरे अधीन है। अतः तू क्षम। [यह सोम से प्रार्थना है।] ॥ दूसरी व्याख्या- 'मन्त्रिणः' (मन्त्रवतः यजमानस्य) दीक्षा प्राप्त यजमान का 'अश्वः'घोड़ा 'हसनाम्' (हसनवतीं यजमान- पत्नीम्) हँसती हुई यजमान की पत्नी को 'उप' (श्लिष्य) समीप में लग कर 'शेपम्' चिन्ह को 'ऋच्छति' प्राप्त होता है या प्रचलित करता है। और सब उक्त प्रकार से है। इस अर्थ में "अश्वमेध" यज्ञ में यजमान पत्नी और अश्व के संबन्ध को लेकर जो क्रिया होती है उसका स्मरण होता है जैसा कि- [का०२०, ६, १६- ] "अश्व शिश्नमुपस्थे कुरुते वृषावाजीति" ॥ 'सुख' यह कल्याण का नाम है। 'कल्याण' पुण्य होता है। 'सुख' क्यों ? वह सुहित = सुन्दर हित होता है। अथवा सुहित को प्राप्त कराता है। (पहिले पक्षमें 'सुख' नाम सुख का ही है और दूसरे पक्षमें सुख के साधन का नाम सुख है।) 'हसना' क्या ? हसिता = हँसने वाली। (अथवा पाता = पालयिता या रक्षा करने वाला।) 'वारि' क्यों ? वह 'वारयति' तृषा = प्यास को बुझा- ता है। "मानो व्याख्यातः" [ यह अपपाठ है । ] "तस्य०" उस (अश्व) की (और) यह ऋचा है ॥२॥ व्याख्या। इस खण्ड की जो व्याख्या ऊपर की गई है, वह यथा