निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 970, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २०४ ) ६ अ० १ पा० ३ खं 'शकुनिः' शक्नोति उन्नेतुम्- आत्मानम् । शक्नोति नदितुम् इतिवा । शक्नोति तक्तितुम्- इतिवा । सर्वतः शङ्करः अस्तु-इतिवा शक्नोतेर्वा ॥ तस्य एषा भवति- ॥३॥ अर्थः- “अश्वो वोल्हा” हे 'इन्दो' सोमः 'मन्त्रियाः' (मन्त्रप्रतिपाद्यस्य इन्द्रस्य) मन्त्र से प्रतिपादन करने योग्य इन्द्र देव का 'अश्वः' घोड़ा 'सुखम्' सुखसे 'रथम्' रथ को वोल्हा (वोढा) खेंचने वाला 'हसनाम्' (हसिताम् = इसनशी- लाम्) हिनसने वाली (घोड़ी) को 'उप' (श्लिष्य) आलिङ्गन करके = उसके साथ चिपटकर 'शेपः' (शेपम्- ऋच्छति) पुरुष चिन्हको प्राप्त होता है प्रचलित करता है । 'भेदौ' उस अश्वके दो भेद हैं [क्यों कि- “हरी इन्द्रस्य” 'इन्द्र के 'हरि' नाम वाले या हरे दो घोड़े हैं' यह निघ, अ० १ खं० १५ में कहा है।] या वे दो शत्रुओं के भेदन करने वाले हैं, और 'रोमशवन्तौ' सांड हैं । (क्यों कि- “लोमशः पुरुषः स्मृतः” लोम = रोम = लिङ्ग इन्द्रिय वाला पुरुष होता है, यह पुरुष का लक्षण है ।) 'मण्डूकः' मेंढक 'वारित' (वारि) जल को 'इच्छति' चाहता है । अर्थात्- अश्व का रथ के लेचलने का सामर्थ्य और मेंढक की प्यास का मिटना वर्षा के द्वारा तेरे अधीन है । इस कारण हे सोम (त्वम्) तू 'इन्द्राय' इन्द्र के लिये 'परि- स्रव' झर । प्रयोजन यह कि-हे सोम तेरे झरने से यज्ञ होगा, यज्ञ से वृष्टि, और वृष्टि से घास अन्न आदि । इस प्रकार