भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 975, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 975

हिन्दी निरुक्त ( २०६ ) ६ अ० १ पा० ३ खं० एवम् दूसरे खण्ड के अन्तिम वाक्य “तस्यैषा भवति” में, प्रथम खण्ड के अन्तिम वाक्य “तस्यैषा भवति” में “अश्वावोल्हा” की भांति “मानो मित्र” की संगति नहीं होती क्योंकि इस मन्त्र का उसकी बुद्धि के अनुसार अर्थ ही नहीं है यह तो अश्व स्तुतिका मन्त्र है इससे यही प्रतीत होता है कि यह उसने अपनी ही बुद्धि से परिकल्पन कर निष्फल मनघडन्त वाक्य जोड़ दिया है। यद्यपि “मानो मित्रः” इस मन्त्र में ‘अश्व’ शब्द स्वयम् नहीं है, जिस से उसके साथ इस मन्त्र के सम्बन्ध विच्छेद की आपत्ति हो सकती है, तथापि ‘वाजिनः’ और ‘सप्तेः’ ये दो पद मन्त्र में अश्व के ही प्रत्यक्ष बोधक हैं, अतः पूर्वोक्त आपत्ति को अवसर नहीं मिल सकता । हां यह निश्चय करना यहां बहुत कठिन न होगा, कि ‘मानो व्यारुधोतः’ इस पाठ को प्रक्षिप्त करने वाले के साम्हने “अश्वो वोढा” यह दूसरा खण्ड अवश्य था । अर्थात्-इस द्वितीय खण्ड की सृष्टि के अनन्तर ही उसकी बुद्धि को यह प्रवेश मिला। अन्यथा एक ‘तस्यैषा’ पाठके होते हुए वह दूसरा वैसा ही पाठ अव्यवहित देश में धर नहीं सकता था ॥२॥ “मानो मित्रः” इसका दीर्घतमा ऋषि है। अश्व का ही आवाहन इस सूक्त में किया गया है ॥ ‘यद्’ (यदा) जब (वयम्) हम ‘देवजातस्य’ (देवैर्जातस्य) देवताओं से उत्पन्न ‘सप्तेः’ (सरणस्य) चलने वाले ‘वाजिनः’ घोड़े के ‘वीर्याणि’ गुणों को ‘विदथे’ (यज्ञे) यज्ञ में ‘प्रव-

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