भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 976, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 976

हिन्दी निरुक्त (२१०) ६ अ० १ पा० ४ खं० वयामः' कहें, तो 'नः' हमें (त्वम्) तू 'मित्रः' मित्र 'वरुणः', वरुण 'अर्यमा' 'आयुः' (वायुः) वायु 'ऋभुक्षाः' अन्तरिक्ष में रहने वाला अथवा देवताओं का राजा 'इन्द्रः' इन्द्र और 'मरु- तः' मरुत् ये सब 'मा-परिख्यन् (प्रत्याचक्षीरन्) न रोकें'। 'आयुः' क्या! वायु। कैसे वह अयन होता है-चलने वाला होता है। यहां 'व' कार के लोप से 'वायु' का 'आयु' है। 'ऋभुक्षाः' क्या ? 'उरुक्षयणः' या उरु = अन्तरिक्ष में क्षयण = रहने वाला होता है। निवास अर्थ में 'क्षि' (तु० प०) धातु से है। अथवा ऋभुओं का = देवताओं का राजा 'ऋभु- क्षाः' होता है। यहां 'ऋभु' पूर्व पद है, और ऐश्वर्य अर्थ में 'क्षि' धातु उत्तर पद । 'शकुनि' (२) (पक्षी) क्यों ? 'शक्नोति' सकता है-अपने को ऊपर की ओर ले जाने को। अथवा 'शक्नोति' सकता है-शब्द करने को। अथवा 'शक्नोति' सकता है-कष्ट से जीने को। अथवा “सर्वतः शंकरोऽस्तु” 'सब ओर कल्याण का करने वाला हो'इस वाक्य का संक्षेप 'शकुनि' शब्द है। अथवा फिर सकने अर्थ में 'शक्' (स्वा० उ०) धातु से है। क्यों कि- क्या वह सकता है, जो उसके सकने योग्य हो। यह 'शकुनि' शब्द इन पांचों व्याख्यानों में-(१)'शक्' (धा०)'नी' (धा०) (२) 'शक्' (धा०) 'नद्' (धा०) (३) 'शक्' (धा०) 'तक्' (धा०) (४) 'शम्' (अव्यय) 'कृ' (धा०) (५) 'शक्नोति' से बनता है। “तस्य०” उसकी यह ऋचा है ॥३॥ (खं० ४) निघ०-“कनिक्रदज्जनुषं प्रब्रुवाण इयर्त्ति वाच-