भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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हिन्दी निरुक्त (१६५) ८ अ० ३ पा० ७ खंड

के अर्थ “प्रेष्य” एतावन्मात्र ही मन्त्र पढ़ेगा किन्तु प्रथम मन्त्र के समान देवता का चतुर्थ्यन्त नाम उसके पूर्व में उच्चारण नहीं करेगा, यह विशेष विधि “आपस्तम्ब” महर्षि कहते हैं- “समिद्भ्यः प्रेष्येति प्रथमं संप्रष्यति प्रेष्य प्रेष्ये- तीतरान् इति” जामदग्न्य सूक्त में अन्य ऋचाएं और उनका प्रयोजन यास्काचार्य ने यहां आप्री देवताओं के निर्वचन प्रकरण में दश आप्रीसूक्तों में से जामदग्न्य ही आप्रीसूक्त दिया है। यह सूक्त ऋग्वेद संहिता में अन्य सब आप्रीसूक्तों में अन्तिम है। इसके चुनाव का प्रयोजन पहिले दिया जा चुका है, अब उसके बीच २ में कुछ और ऋचाएं भी दी गई हैं उनका प्रयोजन भी ज्ञातव्य है, इसी से नीचे उनका प्रयोजन कहा जाता है -- (१) जिस प्रकार आचार्य ने सर्व प्रधान देवताओं के व्याख्यान के अनुरोध से सम्पूर्ण इध्म आदि आप्री देवताओं के नामों का अपने निघण्टु ग्रन्थ में संग्रह किया है, तथा जिस प्रकार सर्वगोत्री याजकों के अनुष्ठानोपयोग के अनुरोध से उन्होंने जामदग्न्य आप्रीसूक्त ही निगम स्थान में रखा है, उसी प्रकार क्रमागत नराशंस देवता के निर्वचन के अनु- रोध से उन्हें नराशंस देवता का भी निगम देना योग्य है। क्योंकि प्रकृत जामदग्न्य सूक्त में नराशंस देवता की ऋचा