भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 960

हिन्दी निरुक्त ( १९३ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० यास्कने दशम सूक्त ही निरुक्त में क्यों लिया ? यास्क मुनि स्वयम् “इति इमानि एकादश आप्री- सूक्तानि” ऐसा उल्लेख करके यहां पर ग्यारह (११) आप्री सूक्तों को स्मरण कर रहे हैं, तथा उनमें से संहितास्थ दशम आप्री सूक्त को ही यहाँ पर इध्म आदि नामों के लिये निगम देते हैं। इस कारण यहां ऐसा प्रश्न स्वतः ही उत्पन्न होता है कि-जब सभी सूक्तों में इध्म आदि देवताओं के निगम विद्यमान हैं, तो अन्तिम सूक्त को ही वे क्यों लेते हैं इसका उत्तर हमें यही प्रतीत होता है, कि संहितास्थ अन्य सब सूक्त सब गोत्रों के लिये उपयुक्त नहीं होते किन्तु वे एक- एक गोत्र के लिए ही प्रयोजनीय होते हैं अतः सर्व प्रसिद्ध होने से यही सूक्त आचार्य ने उल्लिखित किया है। प्रैष सूक्त यद्यपि साधारण है तथापि जैसे (संहितास्थ) निगम प्रायः यहां दिये जाते हैं, उनसे वह विजातीय है, उसका देना भी उन्होंने उचित नहीं समझा। अथवा प्रैषसूक्त में जितने मन्त्र हैं उन सब में प्रधान देवता के नाम के अति- रिक्त प्रायः सब शब्द समान ही आते हैं इस लिए उन सब को उदाहृत करने से प्रति मन्त्र में छात्रों को विलक्षण २ अर्थों का लाभ न होगा, निर्वचन की सामग्री में अल्पता होगी और यहां पर व्यर्थ शब्दों का गौरव होगा। यही सब सोच विचार कर आचार्य ने संहितास्थ दशम सूक्त ही यहां पर दिया है॥ “प्रैष सूक्त और दश सूक्तों का सम्बन्ध” पशु कर्म में जहां ग्यारह प्रयाज होम होते हैं, वहां प्रथम